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    उत्तर प्रदेश जनसंख्या नियंत्रण बिल पर आदिवासिय व दलित गरीबों के बीच बना हैं संशय

    जनसंख्या नियंत्रण कानून आदिवासी, दलित गरीबो को सरकारी योजनाओं के लाभ से करेगा वंचित – अजय राय

    ई.अवधेश सिंह
    चकिया। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश जनसंख्या नियंत्रण बिल लाया गया है। जिसका मकसद जनसंख्या नियंत्रण करना कहा गया है। यह बिल अभी सुझावों एवं आपत्तियों हेतु प्रस्तुत किया गया है। विधायिका द्वारा पास हो जाने पर यह कानून बन कर एक साल बाद लागू हो जाएगा। यद्यपि इस कानून का उद्देश्य जनसंख्या नियंत्रण, स्थिरीकरण एवं कल्याण कहा गया है। वामपंथी नेता अजय राय कहते है कि यह कानून दो से अधिक बच्चों वाले परिवारों कि बड़ी संख्या को दंडित करने, सरकारी नौकरी से वंचित करने, राशन कोटा को घटाने, चुनाव लड़ने से वंचित करने तथा सभी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित करने वाला है जैसाकि निम्नलिखित विवेचन से स्पष्ट है:- इस बिल की धारा 8 में दो से अधिक बच्चों वाले परिवार को (1) कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित करना, (2) केवल चार यूनिट तक राशन सीमित करना, (3) तथा अन्य निर्धारित प्रोत्साहनों से वंचित करना है। 2-बिल की धारा 9 में ग्राम प्रधान, बीडीसी तथा जिला पंचायत का चुनाव लड़ने से वंचित करना। यही प्रतिबंध स्थानीय निकाय के चुनावों पर भी लागू होगा। इनमें से यदि कोई पदाधिकारी दो बच्चों के प्रतिबंध को तोड़ेगा अर्थात दो से अधिक बच्चे पैदा करेगा तो उसे उस पद से हटा दिया जाएगा और भविष्य में चुनाव लड़ने से वर्जित कर दिया जाएगा। 3-बिल की धारा 10 के अनुसार दो बच्चों से अधिक परिवार वाला व्यक्ति सरकारी नौकरी का फार्म नहीं भर सकेगा अर्थात उसे सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी। 4-बिल की धारा 11 के अनुसार नौकरी के दौरान यदि किसी व्यक्ति को दो से अधिक बच्चे हो जाते हैं तो उसकी वेतन वृद्धि रोक दी जाएगी। 5-बिल की धारा 12 के अनुसार दो बच्चों से अधिक परिवार वाले व्यक्ति को किसी प्रकार की सरकारी सब्सिडी नहीं मिलेगी।
    यद्यपि इस बिल में एक या दो बच्चे वाले परिवारों को कई प्रोत्साहन देने की बात भी कही गई है। परंतु इस बिल का सबसे बड़ा कुप्रभाव दलितों, आदिवासियों तथा अन्य गरीब लोगों पर पड़ना है क्योंकि सामान्यतया उनके दो से अधिक बच्चे होते हैं। सरकारी नौकरी नही मिलने, राशन की मात्रा चार यूनिट तक सीमित होने, कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित करने, ग्राम प्रधान, बीडीसी तथा जिला पंचायत का चुनाव लड़ने से वंचित करने तथा सभी प्रकार की सब्सिडी से वंचित कर देने से यह वर्ग अधिक गरीबी, बेरोजगारी एवं भुखमरी का शिकार होंगा। इसका सबसे बुरा असर आदिवासियों पर पड़ेगा क्योंकि वर्तमान में अधिकतर आदिवासियों के दो से अधिक बच्चे हैं। यह सर्वविदित है कि परिवारों में अधिक बच्चे होने का मुख्य कारण गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा तथा परिवार नियोजन एवं स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी होना है। जिन्हें सरकार द्वारा दूर किया जाना चाहिए। परंतु सरकार ऐसा न करके कानून बना कर जनता को दंडित करने का काम कर रही है। इस फ्रन्ट पर योगी सरकार की विफलता कोरोना की पिछली लहर के दौरान उजागर हो चुकी है। उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी चरम सीमा पर है जिसके विरुद्ध नौजवान लगातार आंदोलन कर रहे हैं। गाँव में मजदूर बेरोजगार हैं क्योंकि मनरेगा में भी काम नहीं मिल रहा है। किसान लंबे समय से काले कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन तथा एमएसपी पर खरीद के लिए कानून बना कर खरीद की मांग कर रहे हैं।
    उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि योगी सरकार का प्रस्तावित जनसंख्या नियंत्रण बिल पूर्णतया दलित, आदिवासी एवं गरीब विरोधी है। यह भी उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश की आबादी तथा प्रजनन दर लगातार कम हो रही है और किसी भी तरह से जनसंख्या विस्फोट का खतरा नहीं है। अतः जनसंख्या नियंत्रण के लिए किसी प्रकार का कानून बनाने की कोई भी जरूरत नहीं है।ऐसा प्रतीत होता है कि योगी सरकार का असली मकसद चुनाव तक केवल आम जनता का उसके असली मुद्दों से ध्यान बटाना है। अतः बीजेपी की इस चाल से सभी को सतर्क रहना चाहिए और जनसंख्या नियंत्रण बिल का विरोध करना चाहिए।

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