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    रतनपुरा के क्रांतिकारियों ने ब्रितानिया हुकूमत के दांत कर दिए थे खट्टे,मनवाया था अपने देश प्रेम का लोहा

    19 अगस्त बलिया बलिदान दिवस पर विशेष

    भारत के 3 जनपद उत्तर प्रदेश का बलिया,पश्चिम बंगाल का मेदनीपुर और महाराष्ट्र सतारा जनपद ने आजादी से पहले ही चख लिया स्वतन्त्रता का स्वाद

    बैलगाड़ी में बैठकर मथुरा लाल जी से बिलौंझा मिलने आए थे पंडित जवाहरलाल नेहरू
    ● रामदास लोहार ने छेनी हथौड़ी से अकेले ही खोल डाली थी रतनपुरा से पकवाईनार तक की रेल पटरी
    ● बरवां गांव के बदले रतनपुरा के तरवां गांव पहुंच अंग्रेजी सेना ने तरवां को कर दिया था आग के हवाले
    ● रतनपुरा की देवदह ग्राम पंचायत थी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की शरण स्थली
    ● रतनपुरा के डाकघर एवं रेलवे स्टेशन को किया था आग के हवाले
    ● 16 अगस्त 1942 को हलधरपुर के तत्कालीन थानाध्यक्ष हुए थे असहज, उच्चाधिकारियों से अपनी सुरक्षा हेतु की थी सशस्त्र पुलिस बल की मांग
    ● 19 अगस्त 1942 को चित्तू पांडेय के नेतृत्व में उतारा गया था यूनियन जैक और फहराया गया तिरंगा
    ● कलेक्टर की कुर्सी पर बैठे चित्तू पांडेय, शस्त्रागार ट्रेजरी पर हुआ कब्जा, जेल का फाटक खोल सभी सेनानी किए गए रिहा

    अनिल कुमार वर्मा

    भारत मां के श्री चरणों में अपना सर्वस्व अर्पित करके,कर गए दास्तां मुक्त हमें उनका शत-शत अभिनंदन है ।
    रतनपुरा विकासखंड जो लंबे समय तक बलिया जनपद का अभिन्न अंग रहा अपने ऐतिहासिक गर्भ में क्रांति की अनेक दास्तान समेटे हुए है । यहां के रणबांकुरे ने समय-समय पर अपने साहस और पराक्रम से स्वाधीनता संग्राम के दौरान क्रांति की अनेकों मशालें जलाई । यहां के नौजवानों ने मां भारती के चरणो में अपना सर्वस्व अर्पण करके और आजादी की मशाल जलाकर एक नए इतिहास का सूत्रपात किया यही कारण है कि भारत की आजादी के पहले भारत के जो तीन जनपद आजादी का स्वाद चख चुके थे उसमें बागी बलिया भी सबसे ऊपर था । हिंदुस्तान के 3 जिले जिन्होंने आजादी के पहले ही आजादी का स्वाद चख लिया था, उनमें उत्तर प्रदेश का बलिया,पश्चिम बंगाल का मेदिनीपुर और महाराष्ट्र सतारा जिला शामिल है । बलिया जनपद में आजादी कि जो मसाल यहां के क्रांतिकारियों द्वारा चलाई गई उसमें रतनपुरा विकासखंड के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की अग्रणी भूमिका रही, यही कारण है कि रतनपुरा विकासखंड के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अपने आप में काफी ऊर्जावान एवं प्रेरणाप्रद है । यहां के सेनानियों ने मातृभूमि को अपने खून पसीने से सिंचित कर अपने साहसिक कृत्यों से देश के इतिहास में जो गौरवशाली अध्याय जोड़ा है वह स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा । 1857 में जब प्रथम स्वाधीनता संग्राम का बिगुल बलिया के क्रांतिकारी मंगल पांडेय ने फूंका तो उस समय रतनपुरा विकासखंड के नौजवानों ने भी इस संग्राम में अपनी अहम हिस्सेदारी अदा की । मंगल पांडेय की फौज का पीछा करते हुए जब अंग्रेजी सेना बलिया जनपद में आई तो उसे मुखबिर के द्वारा सूचना मिली की बलिया जनपद के बरवां गांव में मंगल पांडेय के तीन सेनानी छिपे हुए हैं । उनको खोजते हुए जब अंग्रेजी सेना भटक रही थी तभी किसी ने रतनपुरा विकासखंड से लगभग 7 किलोमीटर उत्तर में स्थित तरवा गांव को ही बरवा गांव बता दिया और अंग्रेजी सेना रतनपुरा ब्लॉक के तरवां गांव पहुंच गई । अंग्रेजी सेना ने वहां अपना दमन चक्र चलाना शुरु कर दिया । अंग्रेजी सेना को जब वहां कुछ नहीं मिला तो उसने उस गांव को आग के हवाले कर दिया जिससे भारी जन धन की क्षति हुई । इस घटना ने रतनपुरा के सेनानियों के हौसले और बुलंद कर दिए तथा इससे आक्रोशित होकर आजादी की लड़ाई में अनेक नौजवान कूद पड़े । रतनपुरा विकासखंड की देवदह ग्राम पंचायत जनपद के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की शरण स्थली के रूप में विख्यात थी क्योंकि उस गांव की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि वहां अंग्रेजी फौज का पहुंचना काफी मुश्किल था । जनपद के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की बैठकें अक्सर देवदह में ही हुआ करती थी।
    रतनपुरा विकासखंड के बिलौंझा ग्राम पंचायत निवासी मथुरा लाल उत्तर प्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का मार्गदर्शन करते थे । मथुरा लाल जी के स्वाधीनता संग्राम में दिए गए अप्रतिम योगदान को देखते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली से रतनपुरा तक की यात्रा ट्रेन से की थी तथा रतनपुरा उतरकर बैलगाड़ी से वह बिलौंझा पहुंचे और वहां उन्होंने मथुरा लालजी से भेंट किया तथा स्वाधीनता संग्राम में उनके द्वारा दिए गए अप्रतिम योगदान की भूरि भूरि प्रशंसा की । नेहरू के आगमन का समाचार सुनकर क्षेत्रीय जनता भी काफी उद्वेलित हो गयीं थी और रतनपुरा में काफी संख्या में क्षेत्रीय लोग इकट्ठे हो गए । बिलौंझा से बैलगाड़ी से वापस आने के बाद रतनपुरा बाजार के दक्षिणी छोर पर पंडित नेहरू की एक संक्षिप्त सभा हुई थी, इसी याद में उस स्थान पर जो विद्यालय स्थापित हुआ उसका नाम नेहरू इंटरमीडिएट कॉलेज रखा गया ।
    रतनपुरा ग्राम पंचायत के बिसुकिया मोहल्ले के कारीगर रामदास लोहार तो इस आंदोलन से इतने उद्वेलित हुए कि उन्होंने रतनपुरा से पकवाइनार तक की रेलवे लाइन अकेले ही खोल दी और अंग्रेजी पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी । रतनपुरा से सटे मुबारकपुर ग्राम पंचायत निवासी सरजू पांडेय ने आजादी की लड़ाई में अपना बहुमूल्य योगदान दिया । सरजू पांडेय आंदोलन में युवाओं के प्रेरणा स्रोत बन गए थे और गांव-गांव घूम कर युवाओं को एकत्र कर स्वाधीनता संग्राम में उनकी भूमिका तय करते थे । अंग्रेजी पुलिस ने सरजू पांडे के घर को भी तहस-नहस कर दिया और गांव में कड़ा पहरा बिठा दिया । लुकते छिपते सरयू पांडेय ने रतनपुरा में आजादी की मशाल को काफी तेज कर दिया था परंतु कुछ ही दिनों बाद वह अंग्रेजी पुलिस द्वारा पकड़े गए मथुरा लाल जी भी अंग्रेजी पुलिस द्वारा पकड़ लिए गए और दोनों लोगों को बलिया कारागार के बजाय अंग्रेजी पुलिस ने वाराणसी सेंट्रल जेल में डाल दिया । सरयू पांडेय ने वाराणसी सेंट्रल जेल का अनुभव बयान करते हुए कहा था कि मथुरा लाल जी को वाराणसी सेंट्रल जेल में तत्कालीन प्रशासन के निर्देश पर तनहाई में डाल दिया गया और 24 घंटे तक उन्हें खाने पीने के लिए कुछ भी नहीं दिया गया फिर 24 घंटे बाद उन्हें तन्हाई से निकालकर जेल में चक्की पीसने के लिए कहा गया । जैसे ही वह चक्की पीसने के लिए बैठे तो 24 घंटे से पानी तक नहीं मिलने के कारण वह बेहोश होकर गिर पड़े । उनके गिरते ही पुलिस ने उनके ऊपर डंडों की बौछार कर दी । सरजू पांडेय जी ने बताया था कि मथुरा लालजी के साथ अंग्रेजी पुलिस के इस अमानवीय कृत्य को देखकर सबका खून खौल उठा और आपस में तय हुआ इसका बदला लिया जाएगा । फिर अगले दिन दोपहर को जेल में जब भोजन की पंक्ति बैठी तो वही जेलर जिसने मथुरा लाल जी के साथ अमानवीय कृत्य किया था वहां आया तो हम सभी ने मिलकर अपनी अपनी थालियों से ही उस पर हमला बोल दिया । अचानक हुए इस हमले से पूरा जेल प्रशासन हतप्रभ रह गया और फिर पगली घंटी बजा दी गई इसके बाद बड़ी संख्या में आए सिपाहियों ने हम सब को पीट-पीटकर अधमरा कर दिया फिर भी हम सभी को संतोष था कि हमने मथुरा लालजी के अपमान का बदला ले लिया । यह था आजादी का जोश और जुनून ।
    रतनपुरा ब्लाक के मथुरा लाल,कुलदीप सिंह,धन्नदेव सिंह, जगदीश प्रसाद सिंह, नागेश्वर सिंह,दुखहरण सिंह,केटू राम, रामदास लोहार,राजबली सिंह,लक्ष्मी सिंह,सरजू पांडेय, हरि गोविन्द सिंह,हरिहर सिंह,अवध बिहारी सिंह,नागेश्वर उपाध्याय, कपिल देव सिंह,महेंद्र मिश्र,केशव सिंह और काशीनाथ राय, फूलबदन गोंङ,रामचन्द्र भांट जैसे ऊर्जावान युवाओं की लंबी फौज ने गांव-गांव घूमकर आजादी की वह मशाल प्रज्वलित कर दिया कि यहां का प्रशासन विचलित हो गया ।
    1938 में आजमगढ़ जनपद के पिपरीडीह एवं गाजीपुर जनपद के नन्दगंज में हुई ट्रेन डकैतीयों में रतनपुरा के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही,इस बात का खुलासा तत्कालीन अंग्रेजी प्रशासन के दस्तावेजों से मिलता है ।
    16 अगस्त 1942 को रतनपुरा ब्लाक के गांव गांव से हजारों नौजवानों की भीड़ इन सेनानियों के नेतृत्व में भारत माता की जय और वंदे मातरम का गगनभेदी उद्घोष करते हुए रतनपुरा बाजार में पहुंची और डाक घर पर धावा बोल दिया ।डाकघर के समस्त कागजात,पचासी रुपए नगद और 17 रूपये के डाक टिकट आग के हवाले कर दिया । इसके बाद भीड़ ने रेलवे स्टेशन को भी आग के हवाले कर दिया तथा इसके पश्चात रतनपुरा के नौजवानों की उत्साहित भीङ बीज गोदाम पर पहुंची और जितनी बीज की बोरिया गोदाम में रखी हुई थी सब उठा ले गए । क्रांतिकारियों के नेतृत्व में अचानक हुए इस सुनियोजित घटनाक्रमों से अंग्रेजी प्रशासन घबरा उठा क्योंकि इन घटनाओं की प्रशासन को पूर्व में भनक तक नहीं थी । हलधरपुर के तत्कालीन थानाध्यक्ष तो अचानक हुए इस घटनाक्रम से इतने असहज हो गए कि उन्होंने अपने उच्चाधिकारियों से अपनी सुरक्षा के लिए सशस्त्र पुलिस बल की मांग की । जब तक सशस्त्र पुलिस बल पहुंचता तब तक उत्साही नौजवानों की भीड़ ने भारत माता की जय का उद्घोष करते हुए रेल की पटरियों को भी उखाड़ना शुरू कर दिया और सड़क पर भीड़ ने इस तरह की स्थिति उत्पन्न कर दी कि यातायात पूरी तरह अवरुद्ध हो गया ।
    16 अगस्त 1942 को रतनपुरा में घटित यह घटना संपूर्ण प्रदेश में चर्चा का विषय बन गई । इसी बीच 19 अगस्त को जब जनपद के कोने-कोने से नौजवानों की भीड़ ने बलिया जनपद मुख्यालय के लिए कूच किया तो रतनपुरा ब्लाक के भी गांव गांव से नौजवानों की भीड़ बलिया पहुंची और बलिया टाउन हाल में सभा के बाद जब नौजवानों का हुजूम अलग-अलग जत्थे में क्रांतिकारियों के नेतृत्व में कलेक्ट्रेट पर अलग-अलग रास्ते से धावा बोला तो अंग्रेजी हुकूमत के हाथ पांव फूल गए तथा चित्तू पांडे के नेतृत्व में पहुंचे नौजवानों के हुजूम ने सबसे पहले कलेक्ट्रेट पर लगा यूनियन जैक उतार कर फेंक दिया तथा वहां तिरंगा फहरा दिया इसके बाद तुरंत बलिया के सरकारी खजाने एवं शस्त्रागार को कब्जे में ले लिया गया । जेल का फाटक खोल दिया गया और सभी क्रांतिकारी आजाद हो गए तथा सभी कार्यालयों पर कब्जा कर लिया गया । इस आंदोलन में चित्तू पांडेय, मुरली बाबू और मथुरा लाल जी का विशेष योगदान रहा । जनपद के कोने-कोने से जो क्रांतिकारियों टीम जनपद मुख्यालय पहुंची थी उसे दिन भर भोजन पानी कुछ भी नहीं मिला था ।बलिया के व्यापारियों ने अपनी उदारता और देशभक्ति का परिचय देते हुए इन क्रांतिकारियों के लिए अपना अन्न भंडार खोल दिया और जगह-जगह भोजन बनाकर इन्हें परोसा गया । व्यापारियों ने इस आंदोलन में तन मन धन से सहयोग देकर इस आंदोलन को मंजिल तक पहुंचाया 19 अगस्त 1942 को बलिया से विश्व की सबसे बड़ी अहिंसक जन क्रांति की शुरुआत हुई जिसे संपूर्ण विश्व आज भी श्रद्धा से नमन करते हुए इसे प्रेरणा स्रोत के रूप में स्वीकार करता है । 12 दिनों तक बलिया में स्वतंत्र सरकार निर्बाध गति से अपना कार्य करती रही ।
    जहां एक तरफ बलिया में क्रांति की मशाल चल रही थी वही 1942 में ही रतनपुरा के हलधरपुर ग्राम पंचायत निवासी शिवशंकर सिंह जो इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कानून की शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, उन्होंने भी विश्वविद्यालय में आंदोलन का बिगुल फूंक दिया और इलाहाबाद से लेकर मिर्जापुर तक उन्होंने नौजवानों को इस आंदोलन से जोड़कर, आंदोलन को और धारदार बनाते हुए एक नया अध्याय जोड़ा । शिव शंकर सिंह के नेतृत्व में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में युवाओं ने स्वाधीनता संग्राम कि जो लौ प्रज्वलित की वह स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है ।
    खास बात तो यह भी है कि आजादी के लड़ाई में अपना सर्वस्व निछावर करने वाले इन आजादी के दीवानों की सुधि भी समय-समय पर देश के एवं प्रदेश के शासन में बैठे हुए उच्च पदस्थ जनप्रतिनिधि लेते रहते थे । यहां तक कि समय-समय पर इन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री पत्राचार के माध्यम से इनके स्वास्थ्य की जानकारी लेते थे तथा इन सेनानियों द्वारा क्षेत्र की समस्याओं की तरफ उनका ध्यान आकृष्ट कराए जाने पर ससमय उसे पूरा कर उनका सम्मान किया करते थे ।
    भौगोलिक दृष्टि से रतनपुरा विकास खण्ड वर्तमान में भले ही मऊ जनपद का हिस्सा है, यहां के सेनानियों की स्वाधीनता संग्राम के दौरान रची गई कहानियां आज भी यहां की फिजाओं में तैरती हुई घुल मिल गई हैं । अपने गौरवशाली अतीत और इतिहास से भावी पीढ़ी को रूबरू करा कर उनकी रगों मे राष्ट्रभक्ति का जोश भरने के लिए विगत 15 वर्षों से 19 अगस्त को बलिया बलिदान दिवस मनाते चले आ रहे हैं ।

    (लेखक राज्य उत्कृष्ट शिक्षक पुरस्कार एवं राज्य उत्कृष्ट विद्यालय पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक हैं।)

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