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    Homeसुहास एलवाईः आज़मगढ़ से ओलंपिक तक

    सुहास एलवाईः आज़मगढ़ से ओलंपिक तक

    ’मंजिलें उन्हीं को मिलती है, जिनके इरादों में जान होती है’’

    –      कुमार अम्बुजेश

    सच है कि मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं जिनके इरादों में जान होती है। ये शेर गौतमबुद्धनगर के वर्तमान जिलाधिकारी और पैरालंपिक के सिल्वर ब्वॉय सुहास एलवाई पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। जरा सोचकर देखिए कि एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म से ही दिव्यांग पैदा हुआ लड़का, अपने जूनून और जिद के दम पर देश की सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षा पास करता है। शौकिया तौर पर एक खेल खेलता है और फिर उसमें वो बुलंदी पाता है जिसकी कल्पना तक कर पाना बहुत सारे शारीरिक तौर पर फिट लोगों के लिए सपने जैसा है। यकीनन सुहास एलवाई का सफर इस मायने में बेहद प्रेरणादायी है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सुहास एलवाई की इस नई उपलब्धि में पूर्वांचल के आज़मगढ़ का भी बड़ा योगदान है? अगर नहीं तो ये कहानी भी जाननी जरूरी है।

    आजमगढ़ पोस्टिंग ने बदली सुहास के खेल की दिशा

    2007 बैच के आईएएस अफसर सुहास एलवाई की पोस्टिंग जिलाधिकारी के तौर पर आजमगढ़ में जब हुई थी उस वक्त बैडमिन्टन खेलना उनके लिए सिर्फ एक हॉबी भर थी। शौकिया तौर पर अपने सरकारी आवास के ग्राउन्ड में जब भी वक्त मिलता था सुहास बैडमिन्टन में हाथ जरूर आजमाते थे। लेकिन ये शौक कब जुनून में बदल गया इस बात का अहसास खुद सुहास को भी काफी देर में हुआ। दरअसल बतौर जिलाधिकारी सुहास एलवाई आजमगढ़ में आयोजित स्टेट लेवल बैडमिन्टन चैम्पियनशिप का उद्घाटन करने गये थे। चूंकि बैडमिंटन खेल से उनका दिली जुड़ाव था सो उन्होंने आयोजकों से पूछ लिया कि क्या वो भी इस टूर्नामेंट का हिस्सा बन सकते हैं। आयोजकों ने तत्काल हां कर दी। जिसके बाद सुहास ने रैकेट पकड़ा और उतर गये ग्राउन्ड पर। उस वक्त वहां मौजूद सभी लोग हैरान रह गये जब सुहास ने अपना हुनर दिखाते हुए स्टेट लेवल के कई चैम्पियन्स को मात दे दी।

    इस कामयाबी ने सुहास एलवाई को और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया, और उनका जुनून बाहर निकल आया। फिर क्या था अपने सरकारी कामकाज से जब भी छुट्टी मिलती वो रैकेट लेकर अभ्यास में जुट जाते। सुहास के साथ बैडमिन्टन की प्रैक्टिस करने वाले शिक्षक सत्येन्द्र उपाध्याय इस अभ्यास में उनके शुरुआती जोड़ीदार थे। सत्येन्द्र जो कि खुद भी राज्य स्तर के अच्छे खिलाड़ी रहे हैं। अंतरविश्वविद्यालयी प्रतियोगितायों में पदक जीते हैं उनके साथ अभ्यास करते करते सुहास की मेहनत रंग लाने लगी। सत्येन्द्र उपाध्याय बताते हैं कि अभ्यास के दौरान सुहास एलवाई बेहद कठिन दिनचर्चा का पालन करते थे। सुबह हो या शाम या फिर देर रात, जब भी वक्त मिलता वो फोन करके सत्येन्द्र को बुला लेते और प्रैक्टिस शुरु कर देते। खेल के प्रति उनका लगाव और प्रतिबद्धता को सत्येन्द्र आज तक भूल नहीं पाए हैं।

    अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में बिखेरा जलवा

    आजमगढ़ के जिलाधिकारी रहते हुए सुहास एलवाई ने  पहली बार 2016 में चीन में आयोजित एशियन चैम्पियनशिप में हिस्सा लिया और स्वर्ण पदक जीता। हैरानी की बात ये रही कि इस स्पर्धा में गोल्ड जीतने वाले वो पहले खिलाड़ी बनें जो नॉन रैंक्ड थे, यानी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी कोई रैंकिंग उस वक्त नहीं थी। फिर जो सफर शुरु हुआ वो थमा नहीं, 2017 में तुर्की में हुई पैरा बैडमिंटन में सुहास ने पदक पक्का किया तो कोरोना से पहले 2020 में ब्राजील में बैंडमिंटन स्पर्धा में गोल्ड अपने नाम किया और अब टोक्यो पैरालंपिक में रजत पदक जीतकर अपने खेल को एक ऐसी उंचाई तक ले गये हैं जो कितनों के लिए किसी सपने से कम नहीं

    हालात से लड़कर खुद के लिए बनाया रास्ता

    कर्नाटक के छोटे से जिले शिमोगा के रहने वाले हैं सुहास एलवाई। बचपन में ही दिव्यांगता के चलते उन्हें थोड़ी मुश्किलें आईं लेकिन वो ना तो इस समस्या की वजह से झुके ना ही डिगे। कम्प्यूटर साइंस से इंजीनियरिंग करने के बाद आगे के करियर के लिए अभी कुछ तय कर पाते कि तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई। जिसके बाद उन्होने ठान लिया कि यूपीएससी की परीक्षा को पास करके पिताजी के सपने को पूरा करना है। नतीजा ये हुआ कि 2007 में उन्हें सफलता मिल गई। लेकिन खेल के प्रति समर्पण खत्म नहीं हुआ। लगातार प्रयास और कड़ी मेहनत ने उन्हें अब वो मुकाम दे दिया है जिसके वो हकदार पहले से थे।

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