सत्य वचन बोलने के बराबर कोई तपस्या नही – आचार्य राघवेंद्र शास्त्री

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देवरिया। सलेमपुर नगर के सेंट जेवियर्स रोड पर चल रहे श्रीमदभागवत कथा के दूसरे दिन आचार्य राघवेन्द्र शास्त्री ने शुकदेव परीक्षित संवाद का वर्णन करते हुए कहा कि एक बार परीक्षित महाराज वनों में काफी दूर चले गए। उनको प्यास लगी, पास में समीक ऋषि के आश्रम में पहुंचे और बोले ऋषिवर मुझे पानी पिला दो मुझे प्यास लगी है। लेकिन समीक ऋषि समाधि में लिंन थे, इसलिए पानी नहीं पिला सके। परीक्षित ने सोचा कि इसने मेरा अपमान किया है मुझे भी इसका अपमान करना चाहिए। उसने पास में से एक मरा हुआ सर्प उठाया और समीक ऋषि के गले में डाल दिया। इसकी जानकारी पास में खेल रहे बच्चों ने समीक ऋषि के पुत्र को दी। ऋषि के पुत्र ने नदी का जल हाथ में लेकर शाप दे डाला। जिसने मेरे पिता का अपमान किया है आज से सातवें दिन तक्षक नामक सर्प पक्षी आएगा और उन्हें डस लेगा।
कथावाचक शास्त्री जी ने राजा परीक्षित के चरित्र का वर्णन करते हुए बताया कि पांच साल की अवस्था में पांडवों ने उन्हे राज्य सौंपा। परन्तु संतों की संगति ने उन्हे महान बना दिया। उन्होंने भारत का चतुर्मुखी विकास कराया। चतुर्मुखी विकास का अर्थ आध्यात्मिक विकास,सामाजिक विकास,आर्थिक विकास और संस्कार का विकास।
श्रीमदभागवत कथा को सुनाते हुए आचार्य राघवेन्द्र शास्त्री ने सत्य और असत्य के बारे में विस्तार पूर्वक बताया। उन्होंने कहा कि सत्य वचन बोलने के बराबर कोई तपस्या नहीं और झूठ के समान कोई पाप नहीं है। भगवान सदैव सत्य का साथ देता है। सत्य ही धर्म है असत्य ही अधर्म है।उक्त अवसर पर यजमान त्रिगुणानंद पांडेय,कलावती देवी,डा0 मोहन पांडेय,जिलामंत्री भाजपा अभिषेक जायसवाल,अजय दुबे वत्स,राकेश दुबे के अलावा श्रोतागण में श्रीमदभागवत कथा का रसपान किया।

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