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    Homeउत्तर प्रदेशव्यावसायिक बकरी पालन पर पांच दिवसीय रोजगार परक प्रशिक्षण संपन्न

    व्यावसायिक बकरी पालन पर पांच दिवसीय रोजगार परक प्रशिक्षण संपन्न


    रतनपुरा, मऊ। बकरी पालन व्यवसाय सबसे प्राचीनतम व्यवसाय में से एक है। महात्मा गांधी ने बकरी को गरीब की गाय कहा था। इस 16 से 20 अगस्त 2021 तक चलने वाले व्यावसायिक पांच दिवसीय रोजगारपरक प्रशिक्षण में 20 किसानों ने भाग लिया। इस व्यवसाय को थोड़ी सी पूंजी लगाकर प्रारंभ किया जा सकता है। यह आय का स्रोत अर्जित करने में अत्यंत सहायक है। इस व्यवसाय को करने में अधिक संसाधनों तथा जमीन की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि बकरी छोटे शारीरिक आकार, अधिक प्रजनन क्षमता तथा चरने में कुशल पशु होने के कारण इसे पालना बहुत सरल है । आज के आधुनिक परिवेश में इसे लाभप्रद व्यवसाय बनाने में अच्छी नस्लें विभिन्न जलवायु के अनुरूप विकसित की गई हैं। प्रशिक्षण गोष्ठी में उपर्युक्त जानकारी वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर एल सी वर्मा ने पशुपालकों को दी।      आर्थिक दृष्टि से लाभदायक तथा अन्य पशुओं की तुलना में बकरी पालन के अधिक प्रचलित होने के संदर्भ में कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डा. एल. सी. वर्मा ने बताया कि इस व्यवसाय को शुरू करने मे कम पूंजी, रखने के लिए कम स्थान, एवं कम दाना- चारे की आवश्यकता भी होती है। कम आयु पर प्रजनन शुरू करने तथा हर बार में औसतन 1 से अधिक बच्चा देने एवं सभी प्रकार की जलवायु में सफलतापूर्वक अनुकूलन की क्षमता रखने के कारण सफल व्यवसाय माना जाता है। भारतवर्ष में बकरियों की प्रमुख नस्लें जैसे गद्दी, बरबरी, जमुनापारी, सिरोही तथा बीटल  बकरियां महत्वपूर्ण है। परंतु हमारे उत्तर प्रदेश में बरबरी और जमुनापारी बकरी अधिक पाली जाती है । जिससे अच्छी आमदनी प्राप्त होती है।         केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रशिक्षण समन्वयक डॉ वी.के. सिंह ने बताया कि बकरी पालन से आय के मुख्य साधन उनके दूध तथा उनके बच्चों की एवं खाद की बिक्री से होता है। कम पूंजी से प्रारंभ होना तथा यह व्यवसाय डेयरी फार्म की तुलना में कम जोखिम वाला एवं अधिक लाभ देने वाला होता है। आज बढ़ती हुई महंगाई में जब गाय और भैंस की कीमत और उनके पालने का खर्च बहुत अधिक हो गया है ऐसी स्थिति में बकरी पालन ग्रामीण बेरोजगारों के लिए रोजगार का उत्तम साधन है। बकरी का दूध सुपाच्य और ताकतवर होता है इससे दुग्ध में 4% प्रोटीन होती है तथा वसा का आकार छोटा होने के कारण यह आसानी से पच भी जाता है। इसका दूध बच्चे, वृद्ध व रोगी व्यक्ति के लिए बहुत ही लाभदायक होता है, डॉ सिंह ने आगे कहा कि बकरियों में कुछ प्रमुख बीमारियां होती हैं यदि इस पर नियंत्रण कर लिया जाए तो बकरी पालन बहुत ही आसान हो जाता है। बकरियों के प्रमुख रोगों जैसे  पीपीआर, खुर पका मुंह पका, बकरी चेचक, मुहा रोग, नीली जीभ, गला घोटू जैसी बीमारियों का समय से टीकाकरण करा लेने से बकरी पालन व्यवसाय पूर्ण रूप से सफल हो जाता है। रोग नियंत्रण करने के लिए बच्चों में डायरिया, निमोनिया, आंत्रशोथ से बचाव हेतु उचित देखभाल तथा वयस्कों में परजीवी कीड़ों मे बचाव हेतु कृमि नाशक दवा पशु चिकित्सा अधिकारी की सलाह के अनुसार देना चाहिए। संक्रामक रोगों के विरुद्ध समय समय पर टीकाकरण करना कराना आवश्यक होता है।      केंद्र के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ अजीत वत्स ने बताया कि बकरियों को चारागाह मे चरने पर उसे उसके शारीरिक भार का 1% पौष्टिक आहार के रूप में खाने हेतु दिया जाता है। उदाहरण स्वरूप 30 किलोग्राम शारीरिक भार वाली बकरी को तीन सौ ग्राम पौष्टिक आहार देने की आवश्यकता होती है। बकरियों के आहार के स्रोत के रूप में अनाज वाली फसलों से प्राप्त चारे, फलदार हरे चारे, पेड़ पौधों की पत्तियां तथा विभिन्न प्रकार की चरने योग्य घास खिलाकर पाला जा सकता है।      इस पांच दिवसीय व्यावसायिक रोजगार प्रशिक्षण में ग्राम पिलखी के सरिता राजभर, अमलेश, जसवंत सिंह, बुच्ची देवी, रीना राजभर, पुष्पा, बिजेंद्र यादव, धर्मराज, राम प्रताप तथा ग्राम इकबालपुर से शिव दत्त राम, विशाल कुमार एवं ग्राम मऊ कुबेर से विकास चौहान, विजेंद्र चौहान, जय गोविंद सहित कुल 20 लोगों ने प्रतिभाग किया।

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