More
    HomeUncategorizedविश्व का एक मात्र अनोखा मूंछ नित्य का बेताज बादशाह कैसे बना...

    विश्व का एक मात्र अनोखा मूंछ नित्य का बेताज बादशाह कैसे बना दुकानजी

    प्रयागराज। तीर्थराज प्रयागराज सदैव से आस्था एवं श्रद्धा का केन्द्र रहा है यहाँ गंगा यमुना सरस्वती का पावन त्रिवेणी संगम विश्व पटल पर प्रसिद्ध आध्यात्मिक स्थल है प्रयागराज की महिमा सर्वत्र शास्त्रो मे जहाँ तीर्थराज के रूप मे वर्णित है वही प्रत्येक काल मे किसी न किसी महापुरुष के नाम से भी यह नगर चर्चा मे रहा है महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कर्म भूमि प्रयागराज का दारागंज मुहल्ला सनातन से आकर्षण का प्रमुख स्थल रहा
    इसी धरातल की पवित्र भूमि मे स्थित श्री पंचायती महानिरवाणी अखाड़ा के किराये के मकान मे सन 1963 मे बसन्त पंचमी को स्व0 नन्द कुमार तिवारी व श्री मति स्व0 सुन्दर देवी तिवारी के घर मे चार बेटियो दो बेटों के बाद सबसे छोटे पुत्र के रूप मे जिस बालक का जन्म हुआ उसकी चंचलता को देखकर एक संन्त ने उसका नाम गोपाल रखा शिक्षा प्रारम्भ होने के साथ गोपाल का नाम राजेन्द्र कुमार तिवारी लिखा गया उसकी प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा दारागंज में स्थित शिक्षा मंन्दिरो मे सम्पन्न हुई सामान्य कान्यकुब्ज ब्राम्हण परिवार मे जन्म होने के कारण परिवारिक वातावरण भी सामान्य परिवारो की भांति जिवन यापन मे बाल्यकाल व्यतीत होने के बाद शिक्षा काल मे राजेन्द्र कुमार तिवारी के मन मस्तिष्क मे कुछ अलग करने कि भावना का संचार होने लगा
    उसके पिता आर्मी से रिटायर होने के बाद पत्र पत्रिकाओं धार्मिक पुस्तक की दुकान करने लगे जो दारागंज में निराला पुस्तक के नाम से थी राजेन्द्र स्कूल समय के अतिरिक्त उसी दुकान मे सुबह शाम बैठने लगे
    पढाई मे मन न लगने के कारण उसका मन उटपटांग कार्यों मे लगने लगा दुकान मे कभी कार्टून बनाता कभी कुछ जिसे देख कर लोग हंसते घर के लोग भी कहते पढना लिखना नही यही उटपटांग करो पढाई के लिए मार पढती लेकिन राजेन्द्र सभी पत्र पत्रिकाओं में देखकर कुछ कटिंग कर विविध प्रकार के समसामयिक घटनाओं पर आधारित कार्टून का हास्य व्यंग चित्रों के निर्माण मे दच्छ हो के लोगों को हँसाते और अंन्त मे लिखते राइटर दुकानजी लेखक मकानजी समानजी भगवान जी शैतानजी
    बस लोग उन्हें दुकानजी मकानजी कहने लगे आज उसी नाम से धीरे-धीरे चर्चित होने लगे लेकिन राजेन्द्र के मन मे अलग करने कि लालसा बनी रहती घर के लोग कहते पागल हो गया पढना लिखना नही बस एक धुन अपनी एक अलग पहचान बनाने का और माघमेला कुम्भ मेला लगने पर सिर्फ घूमना और अपने मन मे कोई विचित्र सपना पाले कुछ अद्धभुत कर गुजरने की धून मे लगा रहा
    इसी धून मे घूमते रोज संगम तट पर कल्पवास कर रहे एक औघड़ संन्त के सम्पर्क मे आया उन दिनों कुम्भ का मेला चल रहा था और देश भर से आये संन्त महात्मा प्रयाग की पवित्र भूमि पर आ जूटे थे औघड़ संन्त ने जब विचित्र वेषभूषा वाले किशोर बालक को देखा तो उन्होंने अपने पास बुलाया ईधर आ बेटा क्या नाम है कहाँ रहता है यही ईलहाबाद मे रहता हूँ तभी औघड़ संन्त ने दुकानजी को एक नजर सिर से पाँव तक देखे और बोले तेरे सपने तो बहुत उंचे है बेटे पर लगता है तुम्हें मार्ग दर्शन देने वाला कोई नही मिला दुकानजी सुनते रहे फिर औघड़ ने कहा तू ईश्वर के चरणों मे ध्यान लगा और मन मे साधना कर ले तो एक महान कलाकार बन सकता है वो कैसे महराज जिज्ञासु दुकानजी ने पुछा वही औघड़ जी ने कोई उपाय नही बताया और अपने सानिध्य मे बैठ जाने का इशारा भर किया दुकानजी बैठ गये औघड़ संन्त ने उसे प्रसाद दिया जिसे खाने के बाद दुकानजी उन्ही सन्त के शिष्य बन गये उसने उनके चरण पकड़ लिये और कहा गुरूजी अब आप हमारा मार्गदर्शन करे संत आशीर्वाद की मुद्रा मे स्नेह से दुकानजी के सिर पर हाथ फेरा और मन ही मन कोई मंत्र उच्चारण किया तभी दुकानजी को लगा शरीर में कोई शक्ति प्रवेश कर गयी
    इसके बाद करिब डेढ सप्ताह तक वह उस औघड़ संन्त के शिविर मे हि रह गया जब औघड़ संन्त के कल्पवास की अवधी पुरी हो गयीं और वे अपने आश्रमों की ओर लौटने लगे तो औघड़ संत ने दुकानजी से कहा मेरे संगम प्रवास की अवधि समाप्त हो गयी आज जहाँ से आये हमे यहा से प्रस्थान करना है अब तू बता क्या निर्णय लिया मै क्या बोलूं गुरूजी मै तो पहले ही स्वय को आपके चरणों मे समर्पित कर दिया है और तेरे माता पिता भाई बहन क्या कहेंगे संत ने प्रश्न किया उनके प्रति भी तो तेरा कुछ दायित्व है उनका निर्वाह कैसे करेगा गुरूजी घर मे सब पागल ही मान चूके है अब उन्हें प्रणाम करने तभी जाउगा जब कुछ बन जाऊंगा औघड़ संत ने कुछ सेकंड तक आख मूंद ली और कुछ विचार कर बोले जैसी तेरी मर्जी
    बस उसी रोज दुकानजी उस औघड़ संत के साथ चल पड़े दुकानजी के जिवन का यह विचित्र मोड और संयोग था वह एक निर्विकार वियोगी औघड़ संत का सहचर बन उतुगं हिमालय की कंदराओं मे जिस रहा था जबकि स्वयं उसके मन का संकल्प अनुरागी था वह अपने अंतर मे दिये कलाकार को तराश संवार कर विश्व के कला पटल पर अपने अमिट हस्ताक्षर करना चाहता था
    इलाहाबाद से हरिद्वार रिषिकेश और वहां से पढाव करते करते तिन सप्ताह का पैदल सफर तय करने के बाद जब दुकानजी उस औघड़ के साथ उसके जंगल मे बने कुटिया मे पहुचा तो वहां का समूचा वातावरण सफेद बर्फ की चादर से ओढे हुआ था रक्त जमा देने वाली ठड मे उसे वहां कयी साधू मौजूद थे जो एकदम नंग धडग थे राह मे चलते चलते जब दुकानजी का पुरा शरिर ठड के मारे काप रहा था तो उस औघड़ संत ने एक पौधे से दुधिया कोपल तोडकर उसे हाथ के अंगूठे के नाखून मे रगडकर जीभ मे टच करने को कहा जिसे टच करने के कुछ पल मे ठंड दूर हो गयी उसे वहा का वातावरण सामान्य लगने लगा यात्रा की थकान दूर हो गयी उस बर्फ की चादर मे आसमान के खुले मैदान मे करिब 23 या 24 नागा संत अपने अपने धुनि रमाये हुयें साधना मे लिन थे जिसमें कुछ ने आशीर्वाद दिया रहने के लिये कुछ नियम बतलाये और यह निर्देश दिये की अमुक स्थान से उसके आगे नही जाना है क्योकि वहां गंभीर खतरा हो सकता है उस घड़ी से राजेन्द्र दुकानजी उस जगह रहने लगा संतो ने दुकानजी को अनेकों यौगिक क्रियाओं का अभ्यास कराया सिखाया प्रांत काल जब दैनिक क्रिया से निबृत हो सभी संत योग साधना कर चूकते तो न जाने कहाँ से उन सबके लिए बना बनाया स्वादिष्ट आ जाता दुकानजी भी वही भोजन करने लगा योगिक क्रियाओ मे से एक क्रिया आरम्भ से ही कठीन और घुटन पैदा करने वाली लगी लेकिन दुकानजी ने जब उसका अभ्यास किया तो वह क्रिया भी उसे सामान्य सी प्रतित होने लगी वह क्रिया भी स्वमूत्र पान की ये संत भी स्वमूत्र पान करते थे तथा स्वमूत्र को ही अपने शरिर मे मालिश करते थे उस स्थान पर पहुचने के बाद राजेन्द्र कुमार तिवारी दुकानजी की समूची जिवन शैली ही बदल गयी उसे न अपने माता-पिता भाई बहन सगे सम्बन्धी का स्मरण आया
    इस प्रकार उस हिम कंदरा मे रहते रहते करिब दो महिना 17 दिन बीत गया तो दूसरे दिन सुबह औघड़ संत ने भोजन आदी कराने के बाद अचानक गुस्से मे कहाँ अब तू यहाँ से भाग जा हमने कहा कहाँ जायेगे फिर कहाँ भाग यहा से किन्तु गुरूजी अभी मुझे तो आपके चरणो मे बैठकर सानिध्य में रहकर बहुत कुछ सिखना है फिर आख लाल कर कहा जा यहा से तुझे जो सिखना था तू सीख गया भाग यहा से तुझे तो यहाँ चमत्कारो का बहुत कुछ खजाना मिल गया है अब जा यहा से अपने घर और ध्यान रखना ये जो तेरी मूछें निकल रही है इसे कभी मत कटाना यही तूझे ख्याती प्रसिद्धि देगी राजेंद्र दुकानजी हिचकिचाया सोचने लगा वह यहा से जाये या नही उसे तो दुर्गम दुरूह पथ भी याद नही रहा जिससे चल कर वहां तक साथ मे पहुचा था औघड़ संत संभवत राजेन्द्र की मनो स्थिती भांप गये और उन्होंने उसकी बाहे पकड कर उसे अपनी ओर खीच लिया और गुस्से में बोले जा यह पर्वत स्वयं तुझे राह बतला देगा डरना मत जा अभी तुझे बहुत लम्बा मार्ग तय करना है राजेन्द्र डरता हुआ चल पडा
    चलता रहा कब हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखला पार कर जगलो के रासते से जहाँ रात को जानवरो की दहाड़ लेकिन मन मे गुरूजी का आशीर्वाद कठिनाई से परिपूर्ण भयानक रास्ता पार कर जोशीमठ बद्रिकाआश्रम कैसै दुर्गम पहाडों से रिषिकेश तक आ गया उसे स्वयं ही स्मरण नही रहाँ वहां से राजेन्द्र ईलहाबाद आया तो परिवार के लोग उसके माता-पिता सभी उसे देख आश्चर्यचकित थे अब तक उसकी दाढी मूछे भी बढ रही थी और उसके हाव भाव भी परिवर्तित हो चूके थे अपने घर पहुचने के कुछ दिन बाद राजेन्द्र सोते हुये आखों से एक विलक्षण सपना देखा की वह एक उंचे मंच पर आशिन है उसके सामने हजारों प्रशंसक उसकी ओर निहार रहे है राजेन्द्र की मूछे सामान्य आकार से काफी बड़ी और विचित्र है तथा वे संगीत की धुन पर फडक रही है मानो व किसी नर्तकी की पैरो की भाति थिरक रहीं हैं वह स्वप्न देखते देखते उठ बैठा सोचने लगा क्या यह सम्भव है
    फिर वह यह विचित्र लगने वाली क्रिया का अभ्यास करने लगा वह एकान्त मे करता रहा घर के लोग अचम्भीत रहे ईसे क्या हो गया जबकि मूछे बड़ी नहीं थी फिर भी वह कभी उन पर फूल कभी आलपिन कागज के टुकड़े अगूर आदि रखकर हिलाया करता दर्पण मे उसे अपना प्रतिबिम्ब रोचक लगने लगा फिर हो गया अभ्यास शुरू कयी कयी घंटो निरन्तर करता था उसमे ये नयी प्रतिभा कहाँ से आकर घर कर गयी थी की राजेन्द्र को औघड़ संत के बिदा होते समय के वे शब्द याद थे तूझे तो यहाँ चमत्कारी खजाना मिल गया और उन्ही की प्रेणना कलाक्रितियो पर भी परिलक्षित होने लगी ईनके उपनामो की भीड़ मे राजेन्द्र कुमार तिवारी खोने लगे दुकानजी के नाम से पुकारने लगे और वे मूंछ पर विशेष ध्यान देने लगे वही अपने मूंछ के माध्यम से चर्चित होने लगे और लोगों को हसाने लगे और मूंछ के कला को निखारने के लिए मसल्स पर कंट्रोल पाने के लिये सांस को रोकने की योग क्रिया करने लगे रोज गन्दे पढे हुये जगह पर जाकर सांस रोकने की क्रिया कितनी देर रोक सकते है अपने मूंछ नित्य कला के लिए और धिरे धिरे मूंछ पर कन्ट्रोल कर लिया और मूछें नाचने लगी उनके नित्य के समय बाधा पढने के कारण उन्होने अपने दांत के चौघडे उखडवा दिया फिर शुरू हुआ नित्य कला का सिलसिला
    जैसे कुचिपुडी मणिपुर कत्थक नित्य तो दुकानजीे ने अपने नित्य का नाम मूंछ नित्य रखा जो शरीर के किसी भी अंग को हिलाये बिना हर धूनो पर मूंछ पर मोमबत्ती कैन्डील जलाकर नित्य करने लगे और पूरे दुनियां में भारत का नाम रोशन कर रहे हैं लेकिन जहाँ चाह वही राह की कहावत को चरितार्थ करते हुये दुकानजी ने अपनी कठिन अथक साधना द्वारा मूंछ नित्य कला का अभिनव अविष्कार करने मे सफल सिद्ध हुये और उसका प्रचार प्रसार पूरे विश्व मे प्रिन्ट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया का हाथ बताते है उनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर 1994 मे लिमका बुक आफ वर्ड रेकॉर्ड्स गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड ईडिया बुक ऑफ वर्ल्ड मार्वलेस बुक आफ इंडिया मे नाम अंकित हुआ
    यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की जन सेवक के रूप मे दुकानजी क्या नहीं करते दिख जाते है सरकारी गैर सरकारी जैसी सभी प्रकार की योजनाओं एवं अभियानों मे समर्पित भाव से संलग्न हो जाने वाले दुकानजी सदैव लाभकारी स्थितियों से वंचित रहे है स्वच्छता अभियान गंगा प्रदूषण बेटि बचाओ बेटी पढाओ पल्स पोलियो टीकाकरण पर्यावरण बचाओ सर्व शिक्षा अभियान नशा मुक्ति आन्दोलन एड्स दहेज विरोध भ्रूण हत्या गंगा सफाई पालिथिन यातायात व्यवस्था माघमेला कुम्भ मेला सिविल डिफेन्स आदि के लिए समर्पण भाव आज भी देखा जा सकता है
    प्रयाग की धरती और घर न छोडने के संकल्प लेने वाले समाज स्तर पर दुकानजी का सबसे परिवारिक लगाव रहता है लोगों के सुख दुख मे बराबर आपकी उपस्थिति सराहनीय रहती हैं घर अस्पताल शमशान घाट शादी ब्याह या अन्य उत्सव सभी मे उपस्थिति से लोग निश्चिन्त हो जाते हैं अब दुकानजी आ गये है जो कमी त्रुटी होगी संभाल लेंगे ईस अवधारणा के बाद भी जिस साधारण जीवन मे जन्म लिये थे उसी अर्थाभाव की जीवन झेल रहे है लेकिन सबको हंसाने खुश रखने वाले दुकानजी कोई भी परेशानी हो अपने कार्य के प्रति सजग और खुशमिजाज मे रहते हैं कैसा भी प्रचार प्रसार हो ईसके लिये अपने शरीर मे नये नये परिधान स्लोगन लिखा पहनकर लोगों को जागरूक करने निकल पडते है
    ईनको अपने कला के कठिन साधना के लिये दुकानजी को अपने जीवन में अनेक कठोर निर्णय लेने की चुनौती थी जिसमे सर्व प्रथम अपने भोजन को संतुलित किया ईस प्रकार एक ब्रत लिया खाने मे रोटी 2 परांठा 3 पूडी 4 खाऊंगा इस संकल्प प्रतिज्ञा का नियमित पालन आज तक किया जा रहा है कोई कितना भी दबाव डाले ईसमे कोई समझौता नहीं करते ये पूरे शाकाहारी है यहाँ यह भी उल्लेख करना समीचीन होगा की ईतनी बड़ी उपलब्धि उपरांत भी बेरोजगार इस अद्भुत कलाकार एवं समाज सेवा के प्रति शासन प्रशासन व प्रान्त की सरकार हो अथवा केन्द्र की सरकार किसी ने इस कलाकार को स्थाई अथवा अस्थाई प्रोत्साहन संरक्षण देने के बारे में सोचा तक नहीं देना तो बड़ी बात है स्थानीय जन प्रतिनिधियो ने भी कोरे आश्वासन दे देकर दुकानजी का मात्र उपयोग किया है सहायता कुछ भी नही कर पाये क्योकी कोई भी ऐसा जनप्रतिनिधि मंत्री मुख्यमन्त्री राज्यपाल अथवा अन्य उच्चाधिकारि नहीं बचे होगे जहा अनुरोध न किया हो माता पिता के स्वर्गवास के बाद नौकरी से रिटायर बडे भाई बिनोद चन्द्र तिवारी भाभी डा0 निर्मला तिवारी उनके दो बच्चो के साथ दारागंज अखाड़ा के मकान खाली करने के बाद झूसी मे छोटा मकान बना कर उसी मे उनके साथ अपना जीवन व्यतीत करते चले आ रहे हैं जब की श्री पंचायती महानिरवाणी अखाड़ा के सचिव यमुना पुरी जी ने कहा अखाड़ा टूट कर बनने के बाद दुकानजी को अवश्य देंगे जब तक नही बन रहा ये हमारे साथ रहेगा ईसके लिये हमारे दिल मे जगह है जबकि सासन प्रशासन सरकार को समाज को ऐसे कलाकार समाजसेवी के विषय मे सहयोग के लिए आगे आना चाहिए ये बातें ईलेट्रानिक मिडिया प्रिन्ट मिडिया से कहा दैनिक अखबारो मे छपा ये बडी बात है आज दुकानजी को पूरे दुनियां में ईतनी उचाई तक पहुचाने का श्रेय दुकानजी ईलेट्रानिक मिडिया प्रिन्ट मिडिया को देते है उतनी आमदनी या सहयोग आजीविका चलाने के लिए न होने के कारण अपनी शादी तक नही किया कुछ शहर मोहल्ले लोग उनके समाज सेवा भाव अर्थिक स्थीती को देखते हुए उनके कला को बढावा देने के लिये उनका हर प्रकार से सहयोग करते है जिससे उनका गुजारा चलता है देश विदेश मे विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित व अभिनन्दित किये जाने वाले के मन मे एक ललक और थी एक ऐसा अद्भुत वस्तुओं का संग्रह हो जिसे देखने से लोग आश्चर्य चकित हो इस सपने को साकार करने के लिए दुकानजी जी ने अपने किराये के आवास जो श्री पंचायती महानिरवाणी अखाड़ा के एक 12× 8 के कमरे मे 1989 मे सुसज्जित भी किया बडी कडी मेहनत से एक एक चीज को इकट्ठा करके सड़क पर पडी हुई चिज को उठाकर लोगों से माँग माँग कर जिसमे दुनिया की सबसे छोटी गीता कुरान हर प्रकार के शंख देश विदेश के माचिस डाक टिकट हर तिर्थ स्थानो के जल गांधी का चरखा मिश्र की इमली सबसे बडी लौकी पुरानी घडी रेडियो ट्रांजिस्टर कैमरा दूरबीन पुराने नोट सिक्को का संग्रह दुनिया भर के राष्ट्रीय ध्वज पाण्डुलिपि रामायण महाभारत की अनेकों भाषाओं का अद्भुत संग्रह दुकानजी के इस छोटे से संग्रहालय मे सुलभ था जिससे आने वाले पर्यटक कुम्भ माघमेला मे संग्रहालय को देख कर सराहना करते वही बड़े संग्रहालय बनाने के लिये भूमी सहयोग भवन हेतु अनुरोध किया लेकिन कोई सहयोग नहीं वर्तमान में श्री पंचायती महानिरवाणी अखाड़ा अपने भवन को जमीदोष करके नये निर्माण के लिए कहा जो एक अच्छा सुन्दर अखाड़ा बन कर तैयार होगा ईसकै लिए खाली करने को कहा और आज दुकानजी का कोलाज संग्रहालय खाली होने से कितने समान को दिमक अपने चपेट मे ले लिया कुछ होलिका मे दहन हुआ ईतने दिन के मेहनत को जलते हुए देखकर कष्ट हो रहा था आज उसके साथ एक अन्तराष्ट्रीय कलाकार समाजसेवी जो घर से बेघर हो गया अब दुकानजी ने प्रधानमंत्री राष्ट्रपति मुख्यमन्त्री सांसद विधायक जिलाधिकारी कमिश्नर नगर आयुक्त शहर की महापौर से संग्रहालय और सर ढकने के लिए छत या एक छोटी जगह के लिए गुहार सहयोग मांग रहे है कि आने वाले पीढ़ी को दिखाने के लिए अभी ये कलाकार आश लगाये बैठा है सायद उसकी सहायता सरकार करेगी इस प्रकार दुकानजी सतत् अद्भुत कार्य व कला का प्रदर्शन करते हुये संगीत कला छेत्र मे भी महत्वपूर्ण कार्य किया है आपने अनेक फिल्म सिरियल मे भी भूमिका निभाये है दुकानजी लोकसभा विधानसभा चुनाव भी लड चूके है बिरप्पन के चक्कर मे पकडे भी जा चूके है हर समय सबको हंसाने वाले दुकानजी को बस एक कष्ट है की ये कला उन्ही के साथ ही कही समाप्त हो जाये दुकानजी सबको हंसाने खुश देखने के लिये पैदा हुये दुकानजी का मोबाइल नम्बर चर्चित है 99 निन्यानबे का चक्कर है 19 बडो के आगे उन्नीस बने रहते है 144 एक सौ चौवालिस धारा है 420 चार सौ बीस मे घिरे रहते हैं |

    RELATED ARTICLES

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    - Advertisment -

    Most Popular

    Recent Comments