माघमास की ‘षट्तिला’ एकादशी का माहात्म्य।

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वाराणसी। इस वर्ष षटतिला एकादशी का व्रत 28 जनवरी 2022 शुक्रवार को है। षटतिला एकादशी की कथा एवं व्रत की महिमा भगवान श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिर के संवाद के रूप में पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में वर्णित है।

युधिष्ठिरने पूछा- जगन्नाथ! श्रीकृष्ण आदिदेव! जगत्पते! माघ मास के कृष्णपक्ष में कौन- एकादशी होती है? उसके लिये कैसी विधि है? तथा उसका फल क्या है? महाप्राज्ञ! कृपा करके सब बातें बताइये।

श्रीभगवान् बोले- नृपश्रेष्ठ! सुनो, माघ मास के कृष्णपक्ष की एकादशी, वह ‘षट्तिला’ नाम से विख्यात है जो सब पापों का नाश करने वाली है। अब तुम ‘षट्तिला’ की पापहारिणी कथा सुनो, जिसे मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्य ने दालभ्य से कहा था।

दाल्भ्यने पूछा- ब्रह्मन्! मृत्युलोकमें आये हुए प्राणी प्रायः पापकर्म करते हैं। उन्हें नरक में न जाना पड़े, इसके लिये कौन-सा उपाय है? बताने की कृपा करें।

पुलत्स्य जी बोले- महाभाग! तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है, बतलाता हूँ सुनो। माघ मास आने पर मनुष्य को चाहिये वह नहा-धोकर पवित्र इन्द्रियों को संयम में रखते हुए काम, क्रोध, अहंकार, लोभ और चुगली आदि बुराइयों को त्याग दे। देवाधिदेव! भगवान् का स्मरण करके जल से पैर धोकर भूमि पर पड़े हुए गोबर का संग्रह करे। उसमें तिल और कपास छोड़कर एक सौ आठ पिंडिकाएँ बनाये। फिर माघ में जब आर्द्रा या मूल नक्षत्र आये, तब कृष्णपक्ष की एकादशी करने के लिये नियम ग्रहण करे। भलीभाँति स्नान करके पवित्र हो शुद्ध भाव से देवाधिदेव श्रीविष्णु की पूजा करे। कोई भूल हो जानेपर श्रीकृष्ण का नामोच्चारण करे। रात को जागरण और होम करे। चन्दन, कपूर, नैवेद्य आदि सामग्री से शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले श्रीहरि की पूजा करे।तत्पश्चात् भगवान् का स्मरण करके बारम्बार श्रीकृष्णनाम का उच्चारण करते हुए कुम्हड़े, नारियल अथवा बिजौरे के फल से भगवान्‌ को विधिपूर्वक पूजकर अर्घ्य दे। अन्य सब सामग्रियों के अभाव में सौ सुपारियों के द्वारा भी पूजन और अर्घ्यदान किये जा सकते हैं। अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है-

कृष्ण कृष्ण कृपालुस्त्वमगतीनां गतिर्भव। 

संसारार्णवमग्नानां प्रसीद पुरुषोत्तम ॥ 

नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन। 

सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु महापुरुष पूर्वज ॥ 

गृहाणार्घ्यं मया दत्तं लक्ष्म्या सह जगत्पते ।।

आजाद पत्र

‘सच्चिदानन्द स्वरूप श्रीकृष्ण! आप बड़े दयालु हैं। हम आश्रयहीन जीवों के आप आश्रय दाता होइये। पुरुषोत्तम! हम संसार-समुद्र में डूब रहे हैं, आप हम पर प्रसन्न होइये। कमलनयन! आपको नमस्कार है, विश्वभावन! आपको नमस्कार है। सुब्रह्मण्य! महापुरुष ! सबके पूर्वज! आपको नमस्कार है। जगत्पते! आप लक्ष्मीजी के साथ मेरा दिया हुआ अर्घ्य स्वीकार करें।’

तत्पश्चात् ब्राह्मण की पूजा करे। उसे जल का घड़ा दान करे। साथ ही छाता, जूता और वस्त्र भी दे। दान करते समय ऐसा कहे- ‘इस दान के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण मुझ पर प्रसन्न हों।’ अपनी शक्ति के अनुसार श्रेष्ठ ब्राह्मण को काली गौ दान करे। द्विज श्रेष्ठ! विद्वान् पुरुष को चाहिये कि वह तिल से भरा हुआ पात्र भी दान करे। उन तिलों के बोने पर उनसे जितनी शाखाएँ पैदा हो सकती हैं, उतने हजार वर्षों तक वह स्वर्ग लोक में प्रतिष्ठित होता है । तिल से स्नान करें, तिल का उबटन लगाएं। तिल से होम करें, तिल मिला हुआ जल पीएं, तिल का दान करें और तिल को भोजन के काम में लें। इस प्रकार छः कामों में तिल का उपयोग करने से यह एकादशी षटतिला कहलाती है जो सब पापों का नाश करने वाली है। कहा भी गया है:

‘तिलस्नायी तिलोद्वर्ती तिलहोमी तिलोदकी।

तिलदाता च भोक्ता च षट्तिला पापनाशिनी ॥’

द्वारा: आचार्य पं0 धीरेन्द्र मनीषी।

प्राध्यापक: हरिश्चंद्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय, वाराणसी।

निदेशक: काशिका ज्योतिष अनुसंधान केंद्र।

मो0- 9450209581/ 8840966024

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