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    महर्षि भृगु के श्राप के कारण शिव धरती पर लिंग रूप में पूजे जाते हैं- त्रिदंडी स्वामी

    गाजीपुर जनपद के उंचाडिह में स्थित नागेश्वर नाथ महादेव के परिसर मे चातुर्मास में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में गंगा पुत्र त्रिदंडी स्वामी ने उपस्थित श्रोताओं को ज्ञान एवं वैराग्य की कथामृत का रसपान कराते हुए कहा की एक बार भृगु जी महाराज ऋषियो के साथ यज्ञ कर रहे थे,उन्होंने सोचा इसका फल किसको दिया जाए,कौन श्रेष्ठ है,ब्रम्हा,विष्णु ,महेश, में ,सारे संतो ने परीक्षा करने के लिए भृगु जी को चुना,भृगु जी पहले कैलाश पर गए, वहा शिव जी ने स्वागत नही किया ,अपनी पत्नी के साथ हास परिहास कर रहे थे, भृगु जी ने डाटा, समझ नही आ रहा है, ना स्वागत किया न प्रणाम किया,जा मैं श्राप देता हु, धरती पर लिंग रूप में ही पूजे जाओगे,फिर ब्रम्हा के लोक में गए। वहा भी अप्सराएं नाच रही थी, वहा भी स्वागत नही हुआ ,उन्होंने कहा तुम्हारी धरती पर कही पूजा नही होगी, बस एक पुस्कर में ही तुम्हारी पूजा होगी।
    अंत में नारायण के पास गए तो भगवान सो रहे थे,भृगु जी ने भगवान के सीने पर चरण का प्रहार कर दिया
    तब भगवान नारायण ने कहा कही चरणो में चोट तो नही आई,भृगु जी भगवान के शील स्वभाव,पर रीझ के ,आशीर्वाद दिया पूरी धरती पर आपकी पूजा होगी और जो यज्ञ का अंश भी आपके ही चरणो में आयेगा।

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