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    बच्चों के भविष्य को संवारने के लिये लाखों रुपयों खर्च करके प्रकाशित की गयी किताबें चंद रुपयों के लिये बिक जाती है कबाड़ो में

    पिछले कई वर्षों से बेसिक शिक्षा विभाग की किताबे बिकती रहीं हैं कबाड़ियों के यहां

    तारकेश्वर सिंह
    चंदौली। बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा सर्व शिक्षा अभियान को किस तरह से पलीता लगाया जा रहा है। इसका जीता जागता उदाहरण है बुधवार कै बिछिया में कबाड़ की दुकान में पड़ी वह बहुमूल्य किताबें थी जो हमारे नौनिहालों के भविष्य को सजाने व सवांरने में सहायक साबित होती। वैसे तो जनपद में बेसिक शिक्षा विभाग की किताबों को बेचे जाने की घटना नई नहीं है। इस जनपद में कई बार कबाड़ियों व परचून की दुकानों में यह किताबें भारी मात्रा में मिलती रही है। पहले होता यह रहा है कि बच्चों को बांटने से जो किताबें बच जाती थी।वे किताबें कबाड़ियों व परचून की दुकानों में शोभा बढ़ाती थी। लेकिन इस बार तो हद हो गयी बेसिक शिक्षा विभाग कार्यालय से पिकअप पर लद कर किताबें चली बीआरसी के लिये लेकिन पहुंच गयी कबाड़ी की दुकान में।वह तो भला हो एसडीएम न्यायिक महोदय का कि जिनकी निगाह कबाड़ी के दुकान में पड़ी अपनी दुर्दशा पर रो रही बेचारी किताबों पर पड़ गयी। वरना बेचारी किताबें जिन्हें मुद्रक व प्रकाशक ने सजा धजा कर गांव के बच्चों के भविष्य को संवारने के लिये भेजा था। उन्हें क्या मालूम कि इस विभाग में शिक्षा के साथ साथ अपना जमीर बेचने वाले भी बैठे है। सरकार गांवो के बेसिक विद्यालयों को नीजी विद्यालयों के समकक्ष बनाने के लिये लाखों करोड़ो रुपया पानी की तरह बहा रही है। लेकिन कुछ विभागीय अधिकारी व कर्मचारी है कि कसम खा चुके हैं कि हम नहीं सुधरेंगे। जनपद के बेसिक शिक्षा अधिकारी अभी नये आये है।उन्हें यहां की कार्यशैली समझने में अभी समय लगेगा लेकिन तब तक तो बेसिक शिक्षा विभाग के घुटे घुटाये यह तथा कथित अधिकारी व कर्मचारी विभाग को पलीता लगा चुके होगें। बीएसए साहब यदि जांच में पारदर्शिता बरते तो निश्चित तौर पर विभाग के एक बड़े गिरोह का पर्दाफाश हो सकता है जो इस गोरखधंधे में लगे हुये है।

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