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    पूज्य राजर्षि को शिक्षा के क्षेत्र में उनके महान योगदान को देखते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाए-डा० सानंद

    भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए हमेशा याद किये जायेंगे राजर्षि उदय प्रताप सिंह जूदेव

    गाज़ीपुर। राजर्षि उदय प्रताप सिंह जूदेव की 171 वी जयंती सत्यदेव डिग्री कॉलेज गाज़ीपुर के कैंपस में मनाई गई l आज इस अवसर पर भारत रत्न देने की कॉलेज के प्रबंध निदेशक डॉ सानंद सिंह ने भारत सरकार से मांग किया lउन्होंने कहा कि राजर्षि उदय प्रताप सिंह जूदेव भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए आजीवन याद किए जाएंगे l राजर्षि के द्वारा स्थापित की गई संस्थाएं भारतवर्ष में आज भी प्रमाणित रुप से देश बनाने का काम कर रही हैं l उदय प्रताप कॉलेज के संस्थापक पूज्य राजर्षि उदय प्रताप सिंह जूदेव का जन्म 3 सितंबर 1850 को हुआ था। मात्र 63 वर्ष की अल्पायु में सन् 1913 में देवलोक वासी भी हो गए। वास्तव में भारतीय इतिहास के यह 63 वर्ष राजनीति तथा सांस्कृतिक दृष्टि से उथल-पुथल के थे। पूज्य राजर्षि की जन्म के 7- 8 साल के भीतर ही विदेशी प्रभुत्व के विरुद्ध देश के विभिन्न भागों में ज्वाला भड़क उठी। अंग्रेजों को भारतीय राष्ट्रीयता की यह पाली जबरदस्त चुनौती थी। पूज्य राजर्षि के जीवन का निर्माण काल ऐसे ही बौद्धिक वातावरण में बीता। सर सैयद अहमद खां व पंडित मदन मोहन मालवीय की भांति पूज्य राजर्षि भी देश के पुनर्जागरण के लिए एक ऐसी शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता का अनुभव किया जिसमें राष्ट्र के परंपरागत नैतिक मूल्यों और आधुनिक वैज्ञानिक विचारधारा का पूर्ण सामंजस्य हो। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु उन्होंने 25 नवंबर सन 1909 में यहां पर हीवेट क्षत्रिया हाई स्कूल की स्थापना की जो आज पूर्ण रूप से साधन संपन्न डिग्री कॉलेज के रूप में उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल व पश्चिमी बिहार या यूं कहें की भारत के एक बड़े भूखंड की सेवा कर रहा है। राजर्षि जी चाहते थे की यहां के विद्यार्थी अनुशासन पूर्ण वातावरण में रहकर अपने भीतर प्रशासनिक योग्यता का विकास करें। अपने देश में अपनी भाषा का सिद्धांत राजर्षि के लिए नारा नहीं था बल्कि व्यवहार की चीज थी। वास्तव में उदय प्रताप कॉलेज की स्थापना उन्होंने देश को पर्याप्त संख्या में सुयोग्य प्रशासक देने के उद्देश्य कि जो विदेशी सपत्ता की समाप्ति पर शासन का भार सफलतापूर्वक संभाल सके। वह युवकों को सशक्त देखना चाहते थे जो किसी भी परिस्थिति में निर्भीकता से सामना कर सकें। पूज्य राजर्षि एक महान शिक्षाविद तो थे ही राजनीति में अच्छी समझ थी। सन 1887 में राजर्षि जी ने चेतना को जागरूक करने वाली पुस्तक “democracy not suited to India” लिखा। इसके पीछे उनकी यह सोच थी कि जनतंत्र के मार्ग में अशिक्षा और राजनीतिक चेतना की कमी के कारण उत्पन्न होने वाली कठिनाइयां अति महत्वपूर्ण है। यह सोच थी की यदि हम अपने जनतंत्र को सुरक्षित रखना चाहते हैं इसके दो दुश्मन पहला अशिक्षा दूसरा अनुशासनहीनता पर काबू पाना आवश्यक है। जिसे राजर्षि ने इस संस्था के माध्यम से समूल नष्ट करने का प्रयास किया। पूज्य राजर्षि ने जनतंत्र का तो विरोध किया यह बात सही है लेकिन अगर देखा जाए तो आज जनतंत्र का दम भरने वाले तो हमारे यहां बहुत हैं लेकिन राजर्षि जैसे सच्चे जनसेवक नहीं मिलेंगे। ब्रिटिश शासन में भी राजर्षि जी अपनी बात निर्भिकता से कहते थे। 1893 में इंग्लैंड की प्रसिद्ध पत्रिका 19th सेंचुरी में ब्रिटिश अफसरों के खिलाफ आपका लेख इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उनकी दूसरी पुस्तक जो बहुत महत्वपूर्ण है “ब्रिटिश भारत में राष्ट्रद्रोही कानून” ऐसी पुस्तकें लिखने की हिमाकत उस समय पूज्य राजर्षि ही कर सकते थे। राजर्षि ने अपने जीवन में सदाचार, त्याग व समाज सेवा का संकल्प लिया शायद इसी के चलते उनके शासनकाल में भिनगा कल्याणकारी राज्य( welfare state) रहा। उनकी सोच थी की राजा की अपनी कोई संपत्ति नहीं होती वह तो प्रजा की संपत्ति का संरक्षक होता है जिसका प्रयोग प्रजा के पक्ष में होना चाहिए। ट्रस्टीशिप के लिए महात्मा गांधी जी ने राजाओं को कई बार आवाहन किया परंतु अपने राजर्षि ने इसे बहुत पहले स्वीकार कर लिया था। आप एक प्रौढ़ विचारक थे ब्रिटिश शासन भी पूज्य राजर्षिजी से शिक्षा शासन तथा अन्य पेचीदे सवालों पर विचार विमर्श किया करते थे। भारत के अन्य राजाओं की वाणी जहां अंग्रेजों की चापलूसी में घिसती रही वही राजर्षि की तेज खनकदार आवाज सलाह और चेतावनी के रूप में जाती थी। ब्रिटिश सरकार भी उनकी निर्भीकता व वाकपटुता के आगे झुक जाती थी। उस दौरान भी आपको बहुत सारे सम्मान मिले। 1-राजर्षि जी अवध के पहले रईस थे जिनके यहां गवर्नर स्वयं आए। 2-1890 में प्रांतीय पुलिस कमीशन के सदस्य चुने गए। 3- आप वायसराय काउंसिल के सदस्य बने। 4- विद्वता को देखकर कोलकाता तथा प्रयाग विश्वविद्यालय ने अपना फेलो चुना। 5-शिक्षा कमीशन बनने पर सलाहकार के रूप में सरकार ने आमंत्रित किया। 6-1883 में स्थानीय स्वराज बिल हेतु कमेटी बनी जिसके सदस्य चुने गए। 7-1886 मैं पब्लिक सर्विस कमीशन में भारत सरकार ने प्रांत के प्रतिनिधि के रूप में सदस्य मनोनीत किया। आप द्वारा किए गए कार्य— उदय प्रताप कॉलेज, भिनगाराज अनाथालय कमच्छा, बहराइच में लायल हाल, कॉल्विन तालुकेदार कॉलेज लखनऊ, मेडिकल कॉलेज लखनऊ, सारनाथ मूलगंध कुटी बिहार, काशी नागरी प्रचारिणी सभा काशी, क्षत्रिय महासभा, महेंद्रवी लाज आदि। दुनिया के इतिहास में अनेक ऐसे समाजसेवी हुए हैं जिन्होंने दूसरों से दान लेकर बड़ी-बड़ी संस्थाएं स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है दूसरी ओर ऐसे भी लोग हुए हैं जो अपार संपत्ति के स्वामी रहे और उसका एक छोटा सा भाग समाज सेवा में ब्यय कर प्रशंसा के पात्र बन गए। निसंदेह सभी महापुरुषों का कार्य समाज सेवा की दृष्टि से सराहनीय अवश्य है। किंतु उन लोगों की अपेक्षा उन समाजसेवियों का कार्य कहीं अधिक महत्वपूर्ण तथा सराहनीय है जिन्होंने अपने सीमित साधनों से तपस्वी का जीवन व्यतीत कर अर्थ संचय किया तथा उसे समाज सेवा के कार्य में लगाया। राजर्षि उदय प्रताप सिंह उन्हीं उच्च कोटि के समाजसेवियों में से एक थे। वे छोटी रियासत के राजा थे उनके साधन सीमित थे। शायद इसीलिए राजा की उपाधि उन्हें वंश परंपरा से मिली लेकिन राजर्षि और कर्मयोगी उनके गुणों और क्रियाकलापों के द्वारा भारतीय जनता ने प्रदान किया। ऐसे योगी तपस्वी त्यागी समाजसेवी पूज्य राजर्षि की जन्म जयंती पर कोटिश: नमन करता हूं। साथ ही मैं देश के नीति नियंताओं व विशेषकर सरकार से मैं अपील करता हूं कि पूज्य राजर्षि को शिक्षा के क्षेत्र में उनके महान योगदान को देखते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाए। आज सत्यदेव डिग्री कॉलेज गाज़ीपुर के कैंपस में उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किया गया जिसमें संस्थान के छात्र-छात्राएं प्राध्यापक बंधु उपस्थित रहे।

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