पशुपालन विभाग में कर्मचारियों का टोटा, विभाग की योजनाएं नहीं ले पा रहीं मूर्त रूप

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भांवरकोल । भले ही सरकार किसानों की आमदनी दोगुनी बढ़ाने के लिए खेती के साथ पशुपालन को बढ़ावा देने की कवायद के तहत शासन प़शासन के स्तर से तमाम योजनाएं चलाई जा रही हैं। लेकिन खुद पशुपालन विभाग में कर्मचारियों का टोटा होने से पशुपालन विभाग की योजनाएं मूर्त रूप नहीं ले पा रही हैं। ज्ञात है कि क्षेत्र पंचायत के 64 ग्राम पंचायतों के बाड़ सहित करईल क्षेत्र कृषि कार्य के साथ यहां के किसान पहले से ही मुख्यरूप से पशुपालन पर निर्भर है। ऐसे में इस बड़े विकास खण्ड में पशुचिकित्सा राम भरोसे चल रही है।हालत यह है कि पूरे भांवरकोल विकास खण्ड में महज एक चिकित्सक,एक फार्मासिस्ट एवं एक चतुर्थ श्रेणी की तैनाती है। ऐसे में 40 हजार से अधिक पशुओं की चिकित्सा व्यवस्था का स्वत: आकलन किया जा सकता है। पैरावेटों के सहारे यहां का पशुपालन विभाग रामभरोसे चल रहा है। टीकाकरण आदि कार्यक्रम में कुल 10 पैरावेटों के भरोसे आधा अधूरा चल रहा है। हालत यह है कि पैरावेटों को एक टीकाकरण के लिए महज दो रूपये ही विभाग देता है। हालांकि शासन की ओर से पशुपालन विभाग का मानक के अनुसार पांच हजार पशुओं पर एक पशुचिकित्साधिकारी की तैनाती का प्रावधान है। अलबत्ता इस ब्लाक में पांच पशु उपकेंद्र भी हैं। जहां एक भी पशुधन प्रसार अधिकारी की तैनाती है। क्षेत्र के पशुपालकों की मानें तो पशुचिकित्सकों एवं अन्य कर्मियों की कमी महज साल दो साल से नहीं बल्कि यह स्थिति पांच बर्षो से अधिक समय से बनी है।इस ब्लाक में पिछले एक दशक पूर्व तक दर्जनों दुग्ध डेरीयां संचालित हो रही थी। जिससे पशुपालकों को इसका लाभ मिलता था। जो इसमें से अधिकांश सरकारी डेरियां बंन्द हो चुकी है। ऐसे में कर्मचारियों की कमी के बावजूद विभाग किसानों एवं पशुपालकों की आमदनी कैसे बढाएगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

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