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    HomeUncategorizedदुश्मनों की गोलियों का सामना हम करेगें, आजाद हैं "आजाद" ही रहेगें

    दुश्मनों की गोलियों का सामना हम करेगें, आजाद हैं “आजाद” ही रहेगें

    • चन्द्रशेखर आजाद की शहादत के बाद भी उनके शव के पास जाने में खौफ खाते थे अग्रेंज
    • अमर शहीद चंन्द्रशेखर आजाद के 90 वें शहादत दिवस पर छोटी सी श्रद्धांजलि

    तारकेश्वर सिंह
    चंदौली। शहीद चंद्रशेखर आजाद हमेशा कहा करते थे कि “दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे”।एक वक्त था जब उनके इस नारे को हर युवा रोज दोहराता था।वे जिस शान से मंच से बोलते थे। हजारों युवा उनके साथ जान लुटाने को तैयार हो जाते थे। आज उनकी 90वीं पुण्‍यतिथ‍ि पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुये उनके जीवन से जुड़ी हुयी कुछ महत्वपूर्ण बातों को एक बार फिर याद करते है। अमर क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव के बदरका नामक गाँव में एक बेहद ईमानदार और स्वाभिमानी प्रवृति के पंडित सीताराम तिवारी के घर श्रीमती जगरानी देवी की कोख में हुआ।आजाद को बचपन से ही देशभक्ति में रुचि थी। 1920-21 के वर्ष में वे गाँधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े।और गिरफ्तार हुए।जब जज के समक्ष प्रस्तुत किए गये। जहां उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वतंत्रता’ और ‘जेल’ को उनका निवास बताया। जज ने उन्हें 15 कोड़ों की सजा दी। हर कोड़े के वार के साथ उन्होंने, ‘वन्दे मातरम्‌’ और ‘महात्मा गाँधी की जय’ का स्वर बुलन्द किया। इसके बाद वे सार्वजनिक रूप से आजाद कहलाये। सन् 1922 में गांधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बन गये।इस संस्था के माध्यम से उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में पहले 9 अगस्त, 1925 को काकोरी काण्ड करके फरार हो गये। बाद में एक एक करके सभी क्रान्तिकारी पकड़े गए। पर चन्द्रशेखर आज़ाद कभी भी पुलिस के हाथ में नहीं आए।27 फ़रवरी, 1931 का वह दिन भी आया जब इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में आज़ाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ बैठकर विचार विमर्श कर रहे थे कि तभी वहां अंग्रेजों ने उन्हें घेर लिया। चन्द्रशेखर आजाद ने सुखदेव को तो भगा दिया पर खुद अंग्रेजों का अकेले ही सामना करते रहे।अंत में जब अंग्रेजों की एक गोली उनकी जांघ में लगी तो अपने रिवाल्वर में बची एक गोली को उन्होंने खुद ही अपनी कनपटी पर मार लिया और अंग्रेजों के हाथों मरने की बजाय खुद ही शहीद हो गये। उनका अग्रेजों में इतना खौफ था कि मौत के बाद अंग्रेजी अफसर और पुलिसवाले चन्द्रशेखर आजाद के शव के पास जाने से भी डर रहे थे।

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