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    Homeजनपदथारू समाज आज खुद कर रहे अपनी सहायता-जंग ए हिंदुस्तानी

    थारू समाज आज खुद कर रहे अपनी सहायता-जंग ए हिंदुस्तानी

    ब्यूरो बहराइच मनमोहन तिवारी

    जिला बहराइच अंतर्गत मिहीपुरवा विकासखंड के नेपाल सीमावर्ती थारू बाहुल्य ग्राम पंचायत विशुनापुर से एक ऐसी कहानी निकल के आ रही है जो न सिर्फ आत्मनिर्भरता की मिसाल है बल्कि उन गांवों के लोगों के लिए भी प्रेरणा है जो सरकारी योजनाओं और बैंकों के पास ऋण के लिए चक्कर काटते काटते परेशान हो चुके हैं।
    कतर्नियाघाट वन्यजीव बिहार के जंगलों से घिरे होने तथा थारू बाहुल्य ग्राम पंचायत होने के कारण विशुनापुर की शिक्षा की दर बहुत ही कम हुआ करती थी। अधिकतर लोग कृषि पशुपालन और मजदूरी पर निर्भर रहते हैं। उनके पास खेत और जानवर होने के बावजूद नगद पैसा ना होने के कारण खेती के संबंध में आने वाले सभी प्रकार के खर्चों के लिए आसपास के महाजनों के ऊपर निर्भर रहना पड़ता था । एक तो उन्हें समय से धन नहीं प्राप्त हो पाता था दूसरे यदि प्राप्त भी हो जाता था तो बदले में महंगा ब्याज चुकाना पड़ता था। आमतौर पर ₹100 कर्ज लेने पर हर माह ₹10 देने पड़ते थे जो मात्र 10 महीने में ही मूलधन के बराबर हो जाता था ,ब्याज की रकम द्रोपदी के चीर की तरह बढ़ती चली जाती थी जिसके कारण या तो उन्हें मजदूरी करनी पड़ती थी या फिर अपनी खेती गिरवी रखनी पढ़ती थी। ज्यादातर महाजन और साहूकार फसलों पर ही पैसा दिया करते थे। फसल तैयार होने पर ओने पौने दाम में उनकी उपज खरीद लिया करते थे। अचानक किसी भी प्रकार की आपातकालीन स्थिति में उनके पास बीमारी की इलाज के लिए पैसे भी नहीं मिल पाते थे ।इन्हीं सब समस्याओं को ध्यान में रखते हुए गांव के एक नौजवान बसंत लाल ने गांव के किसान लोगों के साथ वर्ष 2010 में बैठक रखी और लोगों ने तय किया कि हम सभी थोड़ा थोड़ा पैसा जुटाएंगे और महाजनी आज से खुद को मुक्त करेंगे। समूह के गठन के बाद” आदर्श स्वयम सहायता समूह” नाम रखा गया । शुरुआत में कई बार समूह से जुड़े लोग भारतीय स्टेट बैंक की शाखा गिरजापुरी में खाता खुलवाने के लिए गए लेकिन कई दिनों तक दौड़ भाग करने के बाद भी उन लोगों का खाता नहीं खुल सका । इससे इनके मन में बैंक के प्रति अरुचि हो गई और इसके बाद इन्होंने पलट कर बैंक का मुंह नहीं देखा । वापस आकर पैसे के रखरखाव के लिए 3 आदमियों की जिम्मेदारी तय की गई जिसमें एक आदमी लोगों को पैसा जमा करने के लिए प्रेरित करता था। दूसरा आदमी पैसा जमा करता था और तीसरा आदमी पैसे की देखभाल और हिसाब किताब रखता था । समूह की बैठक हर महीने की 1 तारीख और 15 तारीख को होती है बैठक में हर महीने के आय और व्यय हिसाब किताब होता है। सभी सदस्य मिलकर तय करते हैं कि कितना ऋण किस व्यक्ति को देना है और किस व्यक्ति से अभी तक पैसे की वापसी नहीं हो पाई है । समूह के सदस्य उसके दरवाजे पर जाकर पैसे के बाबत बात करते हैं। अब तक समूह के 47 परिवार जुड़े हैं जिनके मुखिया अधिकतर किसान हैं।
    समूह के सदस्य श्री शिवराम कहते हैं कि हमारे गांव के अनीश नाम के एक लड़के का एक्सीडेंट हो गया था और उसका पैर फैक्चर हो गया था। समूह ने उसकी समूह के पैसे से भी मदद की और अलग से भी चंदा लगा कर के उसका इलाज कराया। अब वह बिल्कुल ठीक है । इसी तरह तमाम तरह की बीमारियों और बच्चा पैदा होने के समय आने वाले अचानक खर्चे में समूह
    ने तुरन्त मदद की है।
    समूह के सदस्य परशुराम का कहना है कि समूह बनने के बाद से पिछले 11 वर्षों में उनकी मजबूती आई है और अब वह सही दाम पर अपनी फसलों को बेचते हैं। साहूकार की मनमानी अब उनके गांव में नहीं चल रही है।
    समूह के कोषाध्यक्ष ने बताया कि जो भी समूह के सदस्य हर महीने ₹100 जमा करते हैं उसका रजिस्टर मेंटेन किया जाता है ।प्रत्येक महीने की 1 तारीख और 15 तारीख को समूह के सदस्यों की बैठक होती है जिसमें आय-व्यय का हिसाब पढ़ करके सुनाया जाता है। लोगों का पैसा समूह में पहुंचने के बाद वापस उन्हें ऋण के रुप में प्राप्त हो जाता है इस प्रकार धन के रखरखाव की झंझट भी समाप्त हो जाती है। आवश्यक कार्यों के लिए एक दो लाख रुपए हमेशा गांव में मौजूद रहता है जिसे कोई कभी भी जितनी इच्छा हो उतना उधार के रूप में ले सकता है। इसके बाद बहुत छोटे से मासिक ब्याज के बाद जब चाहे वापस कर सकता है। पिछले 11 साल की साल के समूह के लेनदेन में किसी भी प्रकार का कोई विवाद उत्पन्न नहीं हुआ। समूह ने ब्याज से प्राप्त धन का उपयोग सामुदायिक उपयोग हेतु जरनैटर तथा टेंट के सामानों की खरीद की है जिसे समूह के सदस्यों में उनके मांगलिक कार्यक्रमों में निशुल्क दिया जाता है।
    समूह के सदस्य मुन्नीलाल बताते हैं कि हमारे गांव से 7 किलोमीटर दूर गिरजा पुरी में भारतीय स्टेट बैंक शाखा है लेकिन आए दिन नेटवर्क न होने के कारण बैंक में लेन-देन नहीं हो पाती है और उन्हें खाली हाथ लौट ना पड़ता है। उन्होंने बताया कि बैंक से कर्ज प्राप्त करना बहुत ही टेढ़ी खीर है। जब अपना ही पैसा उन्हें नहीं समय पर मिल पाता है तो ऋण कहां से प्राप्त हो पाएगा?
    समूह के सचिव श्री बसंत लाल का कहना है कि आज समूह को देखकर गांव में कई अन्य समूह व ने हैं । उनके छोटे भाई ने स्वयं अलग एक समूह बनाया है और उसमें भी 6 से सात लाख रुपये तक जमा हैं इसके अलावा एक दर्जन से अधिक छोटे-छोटे समूह गांव में बने हैं जिनमें महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी हो रही है। समूह के सदस्य सरम सिंह का कहना है कि बसंत लाल द्वारा 2011 में शुरू के किए गए इस समूह से प्रेरित होकर ग्राम वासियों ने बसंत लाल को 2021 के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में ग्राम प्रधान पद के लिए रिकार्ड 372 वोटों से जिताया और उन्होंने चुनाव में कई पूर्व प्रधानों को हराया।समूह के संस्थापक तथा सचिव वसंतलाल का कहना है कि जब वह छोटे थे तो अपने पिताजी के साथ महाजनों के पास कर्ज लेने के लिए जाते रहते थे। महाजन दौडा़ते रहते थे और अगर कर्ज भी देते थे तो महंगे ब्याज दर पर कर्ज देते थे या फिर सस्ते रेट पर धान बेचने का करार करना होता था। उन्होंने मन में ठान लिया था । 2010 में उन्होंने अपने खास मित्रों के साथ बैठक की और अपने दिल की बात कही। शुरुआत में सिर्फ सात लोग जुड़े थे और धीरे-धीरे बढ़ते बढ़ते संख्या 47 लोगों तक पहुंच गई। जब उन्होंने समूह के नए सदस्यों को जोड़ने पर रोक लगाई तो गांव में अलग-अलग स्थानों पर दर्जनों समूह ने जन्म ले लिया। आज विशनपुर का प्रत्येक आदमी किसी ना किसी समूह से अवश्य जुड़ा हुआ है।
    आदिवासियों वनवासियों के लिए पिछले 17 वर्षो से कार्य कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता जंग हिंदुस्तानी बताते हैं कि बैंक और सरकारी मशीनरी लोगों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर रही हैं इसलिए लोगों को आगे आना पड़ रहा है। समूह को शुरुआत में
    राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन जोड़ने के प्रयास किए गए थे लेकिन उनकी शर्तें समूह के सदस्यों को पसंद नहीं आई। जिसके कारण उन्होंने आत्मनिर्भर रूप से ही समूह को चलाना उचित समझा।

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