तेल की धार से कराह रही जनता, जिम्मेदार मस्त, उपभोक्ता त्रस्त सरकार मस्त

0
62

महंगाई पर लगाम लगाने में असफल है सरकार

वाराणसी/ अभिषेक त्रिपाठी।

वाराणसी। तेलों मे हो रही सिलसिलेवार बढोतरी ने आम जनता के माथे का पसीना तेल बनकर निकाल रहा है।पेट्रोलियम पदार्थों की महगाई है कि दिन प्रतिदिन दाम चढता ही जा रहा है।धान की फसलों को बोने के लिए जुताई का रेट बढ गया,पानी की चलवाई बढ गया,मजदूरी बढ गया।पहले से ही एडियां रगडकर जीने के लिए मजबूर निम्न मध्यमवर्गीय परिवार आने वाले दिनो के आशंकाओं से भयभीत है।पेट्रोलियम पदार्थों की महंगाई से गाडियों का भाडा बढ जाता है जिससे सभी वस्तुओं का दाम बढ जाता है। मांग ,आपूर्ति और उपलब्धता का अर्थशास्त्रीय सिद्धांत यहां फेल हो रहा है।लाक डाउन के कारण आवागमन पर प्रतिबंध है उत्पाद की मात्रा न्यून है फिर भी पेट्रोलियम पदार्थों का दाम बढ रहा है।इसी तेल ने अब म्युट्रेट होकर रसोई को अपने आगोश में ले लिया है।खाद्यान्न तेलों की मंहगाई ने अपना असर फरवरी मे ही दिखाना शुरु कर दिया था।जून तक आते आते लम्बी छलांग लगाई तो जून के अंत मे नए रिकार्ड बना दिए।अगर ऐसे ही खाने वाले तेलों के दाम बढते रहे तो जल्दी ही कई घरों की कडाहियां सूनी पड जाएंगी। खाने के उपयोग मे सबसे अधिक सरसों के तेल का उपयोग किया जाता है।90 से 100 रूपया प्रति लीटर बिकने वाला तेल 200 तक पहुंच गया है।जबकि दुकानों पर बिकने वाले कृतिम तेल भी 60 से 70 रूपये बढ गए हैं।इसी तरह रिफाइंड आयल 70 से 100 रूपये की कीमत मे जल्दी ही बिक रहा था वो इस समय 130 से 160 तक पहुंच गया है।इस महंगाई का असर सीधे तौर पर लोगों के पेट पर हुआ है।कुछ जानकारों की मानें तो रबी के समय.बोई जाने वाले सरसों की फसलों को लगातार 02 वर्षों से फरवरी मे होने वाला बारिश निगल ले रहा है।जायद के समय बोई जाने वाली सूरजमुखी की खेती जंगली जानवरों और पानी की कमी के कारण जिले मे सूरजमुखी की खेती जंगली जानवरों और पानी की कमी के कारण जिले मे बोई.ही नहीं जाती हैं।उस पर तिलहन का घटता क्षेत्रफल भी एक कारण है।सरकारी मदद या जागरूकता केवल फाइलों तक सीमित रह जा रहा है।धान के कनों से बनाए जाने तेलों मे भी जबरदस्त उछाल चल रहा है।बेलगाम हो चुके तेलों के दामों को लेकर दुकानदारों और उपभोक्ताओं मे हल्का फुल्का बहस हो जा रहा है।अब जबकि खाद्यान्न तेल अति आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी मे आ रहा है तो उसके बेलगाम होने पर सरकारी चुप्पी बहुत कुछ कह रहा है।सब्जियों की दामों मे थोड़ा स्थिरता आई है।कुछ की मानें तो कालाबाजारियों के कारण तेल मे खेल चल रहा है।आपदा को सुअवसर मे बदलने का चांस बेरोकटोक जारी है।एक तरफ कोविड-19 महामारी दूसरी तरफ बेरोजगारी तो तीसरी तरफ से मंहगाई की चक्की अस्तित्व निगलने को आतुर है।बाजार पर से नियंत्रण खत्म होता चला जा रहा है नियन्त्रित करने वाले अपने कमीशन को नियन्त्रित करने लगते हैं।आपदा को अवसर मे बदलने की प्रक्रिया बेरोकटोक जारी है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here