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    Homeजनपदखेती किसानी पूंजीपतियों को सौंप देना चाहती है मोदी सरकार: अनजान

    खेती किसानी पूंजीपतियों को सौंप देना चाहती है मोदी सरकार: अनजान

    किसान विरोधी तीनों काले कानून वापस लो वापस लो के नारे से गूंज उठा वातावरण

    ऋषि राय

    घोसी, मऊ ।
    अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय महासचिव अतुल कुमार अनजान के नेतृत्व में सोमवार को बड़ी संख्या में किसानों ने हाथ मे तिरंगा और लाल झंडा लेकर नगर के बड़ागांव से मझवारा मोड़ तक मार्च किया। मार्च में उ.प्र.किसान सभा, जनवादी किसान सभा सहित कई किसान संगठनों के पदाधिकारी भी शामिल रहे। मार्च के दौरान किसानों द्वारा लगाये जा रहे कृषि एवं किसान हितैषी तथा मोदी सरकार विरोधी नारों से पूरे दिन वातावरण गुंजायमान रहा। मार्च में शामिल किसानों व किसान नेताओं का सड़क की दोनों पटरियों पर खड़े होकर नगरवासियों ने स्वागत किया। काफी लंबे समय बाद नगर की सड़कों पर किसानों का जान सैलाब देख नगरवासी काफी प्रसन्नचित्त रहे।
    बड़ागांव स्थित अपने आवास पर एकत्रित किसानों को सम्बोधित करते हुये अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय महासचिव अतुल कुमार अनजान ने केंद्र की मोदी सरकार द्वारा देशी विदेशी पूंजीपतियों एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में देश के किसानों पर थोपे गए तीन काले कृषि कानूनों के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए इसे देश व किसान हित मे इसे वापस लेने की मांग की। किसान नेता ने कहा कि इन कानूनों के जरिये सरकार खेती किसानी के वर्तमान स्वरूप को तबाह कर हमारी कृषि को बर्बाद करना चाह रही है। खेती किसानी पर निर्भर देश की 80 प्रतिशत आबादी को इन काले कानूनों से तबाह हो जाएंगे। देश की सभी सार्वजनिक इकाइयों को पूजीपतियों के हवाले करने के बाद अब खेती किसानी को भी देशी विदेशी पूजीपतियों को देने जा रही है।
    नए कृषि कानूनों में भंडारण क्षमता की सीमा खत्म कर दिया गया है कृषि उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की इसमे गारन्टी न होने के कारण कृषि उत्पादों को पूँजीपति किसानों से कम कीमत पर खरीद कर अपनी गोदामों में भंडार कर लेंगे और फिर बाजार में ऊंचे दामों पर बेचेंगे। इससे किसान और खरीदकर खाने वाला उपभोक्ता दोनों भुखमरी की कगार पर पहुंच जाएंगे। इन कानून के जरिये सरकार ऐसा वातावरण पैदा कर देगी की किसानों को अपनी जमीन पूंजीपतियों को देनी होगी। इस तरह अपनी ही जमीन पर किसान और उसका परिवार खेत मजदूर बनकर रह जायेगा। किसान की जमीन पर पूजीपतियों को बैंक से ऋण लेने की छूट है और ऋण जमा न करने परने पर बैंक किसान की जमीन बेच देगा। जिसे वही पूँजीपति दूसरी कंपनी बनाकर उसी पैसे से जमीन खरीद लेगा और किसानों की जमीन छिन जाएगी। किसान जमीन को अपनी माँ मानता है और माँ समान जमीन को किसी भी कीमत पर बेचने को तैयार नहीं है। इसीलिए देश भर के किसान आठ महीने से लगातार आंदोलन कर तीनों कृषि कानून वापस लेने की मांग कर रहे हैं। सत्ता और बहुमत के नशे में चूर मोदी सरकार किसानों की मांगों की अनदेखी कर रही है लेकिन किसान भी पूरी मुस्तैदी के साथ डटे हैं। बिना कानून को वापस कराये किसी भी कीमत पर किसान वापस नहीँ होंगे इससे सरकार पूरी तरह घबरा गई है और किसानों पर लाठी, गोली, हवाई फायरिंग, पानी की बौछार सहित तरह तरह से परेशान कर रही है। देश की आजादी के बाद का यह अबतक का सबसे बड़ा आन्दोलन सरकार की ताबूत में आखिरी कील साबित होगा और सरकार को काले कानून वापस करना हो पड़ेगा। उन्होंने किसानों, खेत मजदूरो, छात्रों, नौजवानों, बुद्धिजीवियों एवं व्यपारियो से खेती किसानी को बचाने के लिए आगे आने और किसान आंदोलन का समर्थन करने की अपील की। खेती किसानी बचेगी तब गांव बचेगा और गांव बचेगा तो देश बचेगा। इसलिए यह आंदोलन देश को बचाने का आंदोलन है इसमे बढ़ चढ़कर भाग लेने की जरूरत है।
    तो वही घोसी कोतवाली प्रभारी प्रदीप मिश्र द्वारा परमिशन न होने की वजह से नगर के मझवारा मोड़ पर जुलूस को रोक वापस कोतवाली लाया।

    इस अवसर पर किसान सभा के जिला अध्यक्ष देवेन्द्र मिश्रा, महामंत्री हाजी गुफरान अहमद, किसान नेता शेख हिसामुद्दीन, रामकुमार भारती, रामनरायन सिंह, उदय नारायण राय, संजय राय, एकराम प्रधान, पोनू प्रधान, अनीस अहमद, पीएन सिंह एडवोकेट, फरहान शेख, सुनील पंडित सहित बड़ी संख्या में किसान और किसान प्रतिनिधि शामिल रहे।

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