ऐसा तालाब जहां स्नान करने से मिलती है चरम रोग से मुक्ति

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नदवासराय, मऊ। देवल मुनि की तपोभूमि देवलास पर प्राचीन काल से बालार्क रूप मे स्थापित सूर्य मंदिर बगल स्थित स्थापित सूर्य कुण्ड शिव मंदिर आदि भक्तों के आस्था का केन्द्र है। जहां पूर्वकाल में भगवान श्री राम वन जाते समय रात्री विश्राम किए और सूर्य उपासना कर सूर्य मंदिर की आधारशिला रखे थे। इसके बाद गुप्त्तकालीन शासक विक्रमादित्य द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया। भारत में तीन प्रमुख सूर्य मंंदिर है। जिसमें पहला बालार्क रूप मंदिर देवलास दूसरा काशी मे लोलार्क और तीसरा उड़ीसाा में कोणार्क स्थापित है। देेेवलास की विशेषता है कि इस तपोभूमि पर अलग अलग जाति के एक दर्जन देवालय स्थापित है। यहां प्राचीन काल से सूर्य खष्टी के दिन पौराणिक एवं ऐतिहासिक मेले का आयोजन किया जाता है। जिसमें क्षेत्र व जनपद सहित अन्य स्थानों से आए हजारों श्रद्धालु सूर्य कुंड में स्नान कर मंदिरों में प्रसाद चढ़ाते और मन्नते मांगते है। मंदिर की महत्वपूर्ण गाथाओं को संक्षिप्त रूप में बताया जाता है कि कल्प भेद के आधार पर तीन देवल का वर्णन मिलता है। पहला श्रीमद्भागवत पुराण मे छ़ठवे स्कंद के छठे अध्याय के श्लोक मे वर्णित है। इसके अनुसार दक्ष प्रजापति की आठ कन्यायें थी। जिसमें एक कन्या के पुत्र देवलमुनि थे।जिन्होंने प्राचीन काल में देवलास स्थल पर सूर्य उपासना किया था इसके पश्चात कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष मे सूर्य खष्टी के दिन सूर्य देव ने देवलमुनि को बालरूप मे दर्शन दिया था और दूसरा हरिवंश पुराण में हरिवंश पर्व के तीसरे अध्याय में 44 वां श्लोक है जिसमें देवल का वर्णन है और तीसरा पर्वतराज हिमालय की तीन पुत्रियों में दूसरे नंबर की पुत्री से देवल का विवाह हुआ था इन तीनों प्रमाणो से सिद्ध होता है कि युगो- युगो से जब-जब देवल ऋषि का जन्म हुआ है। तब तब उन्होंने तप स्थल के रूप में देवलास को चुना और देवलास पर तपस्या किया है। जन श्रुतिओं के आधार पर सूर्य मंदिर के बगल स्थित स्थापित इस सूर्य कुंड में जो नियमितता से स्नान करता है उसे चर्म रोग से मुक्ति मिलती है। सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि शरद ऋतु का यहां पहला स्नान लगता है इसके बाद ही अन्य त्योहारों पर अलग अलग स्थानों पर जगह जगह स्नान होता है।

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