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    एशिया के बड़े गांवो में शुमार शहीदों का गांव शेरपुर का अस्तित्व खतरे में- डाo प्रशान्त राय वैज्ञानिक एम्स नई दिल्ली।

    जयशंकर राय

    गाजीपुर । आजादी का अमृत महोत्सव वर्ष चल रहा है लेकिन पूर्वांचल के वे बलिदानी जिन्होने 1942 में राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए अमूल्य बलिदान दिया, दशकों से उन अमर अभिमानी सुरमावो का गांव अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। कभी ब्रिटिश हूकूमत की छक्के छुड़ाने वाले अमर शहीदों के गांव शेरपुर को गंगा नदी तेजी से कतर रही हैं। नदी की कटान से इस ऐतिहासिक गांव का अस्तित्व पुरी तरह से खतरे में पड़ गया है। अगर कटान की विभिषिका इसी तरह जारी रही तो महज एक-दो बर्षों में ही इस का़ंतिकारियों का गांव का इतिहास एवं भूगोल गंगा की धारा में जमींदोज हो जाएगा। इसी ग्राम पंचायत का एक भाग सेमरा पहले से ही ऐसी कटान से अपना अस्तित्व गवां चुका है और आज भी वहां के रहने वाले हजारों विस्थापित परिवार खानाबदोश सी जिन्दगी जीने को विवश हैं जिनकी सुधि लेने वाला न कोई शासन है ना ही प्रशासन। कटान के बाबत हर साल बरसात से पहले थोड़ा सा प्रशासन इस गांव के लिए अपने कागजी सोच में परिवर्तन लाता है थोड़ा बहुत बोल्डर गिराता है और फिर बाढ़ में बहा भी देता है। जाहिर है सिंचाई बिभाग के पा़क्कलन में खोट रही है। वास्तव में अगर कहा जाए तो मात्र दिखावे के लिए प्रशासन गांव के लिए काम करता है जबकि वास्तव में ये काम भी बिभागीय अधिकारी एवं कार्यदाई संस्था के लोग अवमुक्त धन का बंन्दरबांट कर अपनी जेबें को भरते है। क्योंकि बोल्डर चाहे दो ट्रक गिराया या दो हजार ट्रक बरसात से ठीक पहले कागजी खाना पूर्ति जोरो पर करके बाढ़ में बहा दिया जाता है। इसमें माननीय लोगों के साथ साथ प्रशासनिक अधिकारियों की ही केवल बल्ले बल्ले रहती है। हालत यह है कि कार्यदाई संस्था की शिकायत पर विभाग के अधिकारी आंख मूद लेते हैं। जाहिर है उनकी राजनीतिक पकड़ सत्ता पर भारी पड़ती है। गांव वासियों के लिए तो अस्तित्व बचाने का संघर्ष ही काफी होता है उससे समय मिले तो प्रशासन से काम कराने के लिए संघर्ष करें लोग। पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जनपद के शेरपुर गाँव के 11 लोगों का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है । उत्तर प्रदेश के सुदूर पूर्व के जिले गाजीपुर की मुहम्मदाबाद तहसील पर 18 अगस्त 1942 को तिरंगा लहराते हुए शेरपुर गाँव के आठ लोग वीरगति को प्राप्त हुए, शेष तीन लोग 24 अगस्त को शेरपुर गाँव में अंग्रेजों की लूट और अत्याचार के विरोध में शहीद हुए। यह स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास की अनोखी घटना है, जहाँ वीरों ने अहिंसात्मक प्रतिरोध करते हुए सीने पर गोली खाई वीरों ने भारत की आजादी का मंत्र रूप ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ को सिर्फ नारा नहीं विचार रूप में अपने मन-मस्तिष्क में बसाया और इसी की परिणति 18 अगस्त 1942 को मुहम्मदाबाद तहसील पर तिरंगा फहराने को लेकर हुई, यह वीरता और राष्ट्र-प्रेम का अनुपम उदाहरण है। शेरपुर एक ऐतिहासिक धरोहर जो कि एशिया के कुछ एक बड़े गांवो की शुचि में शुमार होने के साथ साथ स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय योगदान दिया है, अब अपने अस्तित्व के लिए प्राकृतिक आपदा गंगा की कटान से दशकों से जूझ रहा है और सरकारी तंत्र के विफलता का उदाहरण बनकर मूकदर्शक बना हुआ है। कार्ल आर पापट का ये कथन, इतिहास “याद” रखने की वस्तु है, यह वर्तमान अतीत को किस रूप से अपने अन्दर जीवित रखता है, यही अतीत को अर्थ प्रदान करता है। इतिहास का कोई अर्थ नही होता, क्योंकि इतिहास का कोई लक्ष्य नही है आज सरकारी उपेक्षा के चलते शेरपुर पर एकदम सटीक बैठ रहा है। ग्रामसभा शेरपुर का नागरिक होने के नाते अपने नैतिक कर्तव्य निर्वहन हेतु यही एक उम्मीद बनाकर अपने गांव के इतिहास को याद दिलाने और फिर लोगो को जगाने की उम्मीद से मैं डॉक्टर प्रशान्त राय आपके अखबार के माध्यम से यह जनमानस में अपील करना चाहूंगा कि अब हम ग्रामवासियों के फिर से जगाने का समय आ गया है, जबतक हम सब लोग अंगुली की जगह मुट्ठी बनकर इस आपदा से बचाव के लिए प्रशासन से, सरकार से गुहार नही करते तब तक अपना गांव बचने वाला नही है और मां गंगा की गोद में समाहित होने ही लगेगा।

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