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    आत्महत्या की दर में कमी लाना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है डॉ मनोज कुमार तिवारी

    विश्व आत्महत्या निवारण दिवस दस सितम्बर पर विशेष

    अभिषेक त्रिपाठी/वाराणसी

    वाराणसी। विश्व आत्महत्या निवारण दिवस का उद्देश्य लोगों को आत्महत्या के निवारण के उपायों से अवगत कराना है। कोरोना महामारी के कारण आत्महत्या के विचार एवं प्रयास में वृद्धि देखी जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस वर्ष का नारा दिया है- कार्यवाही के द्वारा आशा जगाना। निराशा आत्महत्या के लिए एक बड़ा कारण है व्यक्ति में आशा का संचार करके आत्महत्या को रोका जा सकता है। आत्महत्या एक असामान्य व्यवहार है जिसमें प्राणी स्वयं की हत्या करता है। पहले व्यक्ति में बार-बार आत्महत्या के विचार आते हैं, वह अनेक प्रश्नों से जूझता रहता है और फिर आत्महत्या का प्रयास करता है। आत्महत्या के सभी प्रयास सफल नहीं होता है, आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि 25 व्यक्तियों व्दारा आत्महत्या का प्रयास करने पर उनमें से एक व्यक्ति की मौत होती है।

    दुनिया में हर 40 सेकेंड पर एक व्यक्ति की मृत्यु आत्महत्या से होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विगत 45 वर्षों में आत्महत्या की दर में लगभग 60% की वृद्धि हुई है। वर्ष में लगभग 10 लाख लोगों की मृत्यु आत्महत्या के कारण होती है। विश्व में होने वाले कुल आत्महत्या में से 21% आत्महत्या भारत में होती है। भारत में प्रति एक लाख में 11 लोग आत्महत्या करते हैं। लैंसेट पब्लिक पत्रिका के अनुसार विश्व की कुल 18% महिलाएं भारत में रहती हैं जबकि विश्व में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले कुल आत्महत्या में भारतीय महिलाओं की हिस्सेदारी 36% है। ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज (2019) के अनुसार भारत में हर 4 मिनट में एक आत्महत्या होती है। 15 – 24 वर्ष के लोगों के मृत्यु का आत्महत्या दूसरा सबसे बड़ा कारण है। महिलाओं द्वारा आत्महत्या का प्रयास 3 गुना अधिक किया जाता है। 81% लोग आत्महत्या करने से पूर्व इसका संकेत अवश्य देते हैं किसी ने किसी से इसके बारे में चर्चा करते हैं या लिखते हैं।

    कोरोना महामारी के कारण लोग तनाव, दुश्चिंता, भय, अनिश्चितता, आर्थिक समस्याएं, नकारात्मक संवेग, क्रोध, नींद की समस्या, नौकरी छोड़ जाने, नशे का अधिक प्रयोग, अकेलापन जैसी अनेक समस्याओं से जूझ रहें हैं, जो आत्महत्या के जोखिम को बढ़ाते हैं। सुसाइड प्रीवेंशन इंडिया फाउंडेशन (एसपीआईएफ) ने एक सर्वे के आधार पर बताया कि कोरोना महामारी के कारण लोगों में आत्महत्या के विचार व प्रयास कई गुना बढ़ गया है।

    आत्महत्या के कारण हैं

    आर्थिक तनाव
    सामाजिक अलगाव की स्थिति
    प्रिय जनों से मुलाकात न कर पाना स्वस्थ मनोरंजन की कमी
    नौकरी छूट जाना
    सामुदायिक क्रियाकलापों में शामिल न होना
    धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता न करना
    घरेलू कलह
    समायोजन संबंधी समस्याएं
    अनिश्चितता एवं भय का माहौल
    मानसिक विकार
    भावनाओं पर नियंत्रण न रख पाना समायोजन क्षमता की कमी

    आत्महत्या का विचार रखने वाले व्यक्ति के लक्षण

    बार-बार मरने की इच्छा व्यक्त करना वास्तव में व्यक्ति आत्महत्या करने से पूर्व अपने परिवार, दोस्त व परिचितों से इसके बारे में चर्चा करता है ताकि लोग उसकी सहायता करें ।
    निराशावादी सोच प्रकट करना कहना कि मैं जी कर क्या करूंगा, मेरे जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है।
    उच्च स्तर का दोष भाव व्यक्त करना।
    असहाय महसूस करना।
    अपने को मूल्यहीन समझना
    जोखिम पूर्ण व्यवहार करना
    अचानक से व्यवहार एवं दिनचर्या में परिवर्तन होना
    नशे का बहुत अधिक उपयोग करना
    अपने पसंदीदा कार्यों में भी अरुचि दिखाना
    परिवार व मित्रों से दूरी बना लेना
    स्वयं को समाप्त करने का अवसर एवं साधन तलाश करना।

    आत्महत्या निवारण के उपाय

    शारीरिक, मानसिक एवं साम्बेगिक रुप से लोगों से जुड़े रहें क्योंकि अकेलापन आत्महत्या के लिए एक बड़ा जोखिम कारक है।
    अपने उत्साह को बनाए रखें तथा दूसरों का भी उत्साहवर्धन करते रहें।
    स्वास्थ संबंधी समस्या होने पर उपचार कराएं।
    अपने मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें।
    मन में आत्महत्या का विचार आने पर प्रशिक्षित एवं अनुभवी मनोवैज्ञानिक से परामर्श लें।
    धैर्य बनाए रखें
    धनात्मक सोच रखें
    उन स्थितियों पर ध्यान दें जो आपके नियंत्रण नियंत्रण में हो।
    अपने रुचियां व शौक को भी पर्याप्त समय एवं महत्व प्रदान करें
    स्वस्थ मनोरंजन करें
    परिवार के साथ धनात्मक समय व्यतीत करें
    बच्चों के साथ खेलें
    अपने सृजनात्मक क्षमताओं का विकास करें
    अपने को स्वयं प्रेरित करें
    जीवन के अच्छे दिनों एवं घटनाओं का स्मरण करें

    आत्महत्या निवारण में परिवार की भूमिका

    आत्महत्या के विचार रखने वाले व्यक्ति से बातचीत करें ताकि वह अपनी भावनाओं को साझा कर सकें ऐसे व्यक्ति को सांत्वना एवं साम्वेगिक समर्थन दें
    जिनमें आत्महत्या का उच्च जोखिम हो उन्हें अकेला कभी न छोड़ें
    आत्महत्या के साधनों को उनसे दूर रखें
    किसी को बार-बार दोष न दें तथा डांटे न।
    परिवार में मनमुटाव की स्थिति को लंबे समय तक जारी न रखें।
    परिवार में किसी बात को लेकर बहस हो तो उसे यथाशीघ्र समाप्त करने का प्रयास करें
    परिवार में आलोचनात्मक बातें नहीं होनी चाहिए
    बातचीत में नकारात्मकता नहीं होनी चाहिए
    परिवार में सकारात्मक वातावरण बनाकर रखें,
    घर में अध्ययन, पूजा-पाठ व उत्सव को महत्व दें
    परिवार के साथ भोजन व चर्चा करें
    बच्चों को अच्छी कहानियां सुनाएं
    परिवार में बुजुर्गों से सलाह मशविरा करते रहें
    निराशा का भाव दिखाई पड़े तो बातचीत करके उसका हौसला अफजाई करें।
    आत्महत्या के लक्षण दिखाई पड़े तो मनोचिकित्सा के लिए प्रोत्साहित करें।

    आत्महत्या निवारण में शिक्षकों की भूमिका

    छात्र की कमजोरियों को सार्वजनिक न करें
    छात्र की गलतियों को व्यक्तिगत रूप से अवगत कराकर सुधार का अवसर दें
    सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा न करें
    दूसरे छात्रों से अतार्किक रूप से तुलना न करें
    छात्रों को क्षमता से अधिक निष्पादन के लिए दबाव न दें
    छात्रों के प्रति सौहार्दपूर्ण व सहयोगात्मक व्यवहार रखें
    छात्रों का उत्साहवर्धन करें
    छात्रों को समस्या समाधान में आत्मनिर्भर बनाएं
    छात्रों में परस्पर सहयोग की भावना का विकास करें
    छात्रों को ऐसे कार्य का अवसर दें जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़े
    छात्रों के व्यवहार में असामान्य परिवर्तन होने पर अभिभावक से बातचीत करें
    स्कूल व कक्षा का वातावरण तनाव रहित रखें।

    छोटे-छोटे प्रयासों के द्वारा हम सब मिलकर आत्महत्या को मात दे सकते हैं आत्महत्या को हराने के लिए हम सबको एक दूसरे के प्रति सौहार्दपूर्ण भावना के साथ सहयोग करने की प्रवृत्ति विकसित करनी होगी जो बचपन से ही परवरिश के माध्यम से बच्चों में विकसित किया जा सकता है।

    डॉ मनोज कुमार तिवारी
    वरिष्ठ परामर्शदाता
    ए आर टी सेंटर, एसएस हॉस्पिटल, आई एम एस, बीएचयू, वाराणसी

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